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ग़ज़ल..डरावनी सी रात थी बड़ा अजीब ख्वाब था-बृजेश कुमार 'ब्रज'

मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन
1212   1212    1212    1212


निगाह  में उदासियां  छुपा हुआ अज़ाब था

डरावनी सी रात थी बड़ा अजीब ख्वाब था

दिखी नहीं कली कहीं ख़ुशी से कोई झूमती
लबों लबों कराह और आँख आँख आब था

चमन में छा रही थीं बेशुमार बदहवासियां
न  टेसुओं  पे नूर था  न सुर्खरू  गुलाब था

मिला न साथ दे सका जो चाहिए मिला नहीं
थी चार दिन की ज़िंदगानी दर्द बेहिसाब था

फ़ुज़ूल थे सवाल और चीखना फ़ुज़ूल 'ब्रज'
ख़मोशियाँ कमाल थी हरेक लाजबाब था

(मौलिक एवं अप्रकाशित) 
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 15, 2020 at 7:43pm

आदरणीय धामी जी ग़ज़ल पे आपकी उपस्थित उत्साहबर्धक है...हार्दिक आभार आपका

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 16, 2019 at 7:53pm

आ. भाई ब्रिजेश जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 12, 2019 at 10:18am

आपका उत्साहवर्धन अति महत्वपूर्ण है आदरणीय समर जी..आपके बताये अनुसार सुधार करता हूँ..कई बार की पेड ऐसी समस्याएं उत्पन्न कर देता है।लेकिन आपकी बारीक़ नज्र नहीं...

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 12, 2019 at 10:14am

आदरणीय तेजवीर सिंह जी...आपके सुन्दर मनोहारी शब्दों के लिए हार्दिक अभिनदंन वंदन...

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 12, 2019 at 10:14am

आदरणीय सुशील जी ग़ज़ल पे आपकी उपस्थित और हौसलाफजाई के लिए शुक्रिया...

Comment by Samar kabeer on October 11, 2019 at 7:33pm

जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

'चमन में छा रही थी बेशुमार बदहवासियां'

इस मिसरे में 'थी' को "थीं" कर लें ।

'फ़िजूल थे सवाल और चीखना फ़िजूल 'ब्रज'

ख़मोशियाँ कमाल थी हरेक लाजबाब था'

इस शैर के ऊला में 'फ़िज़ूल' को "फ़ुज़ूल" कर लें,और सानी में 'थी' को "थीं" कर लें ।

Comment by TEJ VEER SINGH on October 11, 2019 at 11:09am

हार्दिक बधाई आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी। वर्तमान हालात पर तंज करती बेहतरीन गज़ल। शानदार कटाक्ष।

चमन में छा रही थी बेशुमार बदहवासियां
न  टेसुओं  पे नूर था  न सुर्खरू  गुलाब था

Comment by Sushil Sarna on October 10, 2019 at 5:11pm

निगाह में उदासियां छुपा हुआ अज़ाब था

डरावनी सी रात थी बड़ा अजीब ख्वाब था

दिखी नहीं कली कहीं ख़ुशी से कोई झूमती

लबों लबों कराह और आँख आँख आब था

आदरणीय बृजेश जी बहुत ही खूबसूरत अहसासों को समेटे इस ग़ज़ल के दिल से बधाई।

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