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मैं वक्त कहाँ कब रुकता हूँ .

22-22-22-22

मैं कुछ और कहाँ कहता हूँ।।
गैरों से लिपटा - अपना हूँ।।

वैमनष्यता न सर उठा पाए।
दुश्मन की तरहा रहता हूँ।।

दरपण भी छू सकता है क्या।
बस ये ऐसे ही - पूछा हूँ।

कलियाँ खुशबू बिखरायेंगी।
मैं वक़्त कहाँ कब रुकता हूँ।।

आमोद रखो, बिश्वास रखो।
पग पग जीवन में अच्छा हूँ।।


..अमोद बिंदौरी / मौलिक अप्रकाशित

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Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on March 17, 2019 at 4:54pm

आद0 आमोद श्रीवास्तव जी सादर अभिवादन। बढ़िया प्रयास है, बधाई स्वीकार कीजिये।

Comment by Samar kabeer on March 12, 2019 at 2:20pm

"ग़ज़ल की कक्षा" में जनाब अजय तिवारी साहिब का आलेख "मीर द्वारा इस्तेमाल की गई बहरैं" का अध्यन करें ।

वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि 22 को 112 ले सकते हैं,और इस बह्र में गेयता का विशेष ध्यान रखना पड़ता है ।

Comment by amod shrivastav (bindouri) on March 12, 2019 at 1:42pm

कलियाँ खुशबू बिखरायेगी।

मैं समय का बहता दरया हूँ।।..(मुझे इसमें रब्त भी नही लगा और  समय का' भी भ्रमित कर रहा था

आमोद लिये बिस्वास बढ़ो...इसमें द-लि.. क्या 2 होगा??

पग -पग जीवन में अच्छा हूँ।

Comment by amod shrivastav (bindouri) on March 12, 2019 at 1:27pm

आ समर दादा प्रणाम ..

दादा इन बहरों की एक जानकारी चाहिए थी ..क्या इन में मात्रा भार गिर सकता है । 

जैसे मूलतः ..22 को 112, या 211 में जोड़ कर पूरा होता है ।

मैं यहाँ भ्रमित हो गया 

"मैं समय का' बहता दरिया हूँ " ये "समयक "

 इसी तरह ... वैमन स्यता'न...

कृपया इस पर मर्गदर्शन दीजियेगा

Comment by Samar kabeer on March 12, 2019 at 12:23pm

जनाब आमोद बिंदौरी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'वैमनष्यता न सर उठा पाए।
दुश्मन की तरहा रहता हूँ'

ये शैर बह्र में नहीं,देखिये ।

'मैं वक़्त कहाँ कब रुकता हूँ'

ये मिसरा लय में नहीं है ।

'आमोद रखो, बिश्वास रखो'

ये मिसरा लय में नहीं है ।

कृपया ध्यान दे...

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