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Amod shrivastav (bindouri)'s Blog (82)

समय के साथ भी सीखा गया है ।

122-2122-2122



समय के साथ भी सीखा गया है ।।

ये गुजरा दौर भी बतला गया है ।।

मेरी मजबूरियां अब मत गिनो तुम ।

मेरे संग हो तो सब देखा गया है ।।

सभी उस्ताद बनकर ही नहीं हैं।

मुझे अधभर में ही रख्खा गया है ।।

ये तेरा प्रेम कब छूटेगा मुझसे ।

मेरे चहरे में ये बस सा गया है ।।

मेरे भी चाहने वाले मिलेंगे।

मुझे कहकर यही बिछड़ा गया है ।।

कभी वो इन्तेहाँ मेरा भी ले…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on April 17, 2019 at 11:30am — 5 Comments

सुब्ह शाम की तरह अब ये रात भी गई ..

2121-212-2121-212

सुब्ह शाम की तरह अब ये रात भी गई।।

ख़ैरख्वाह वो बने,खैर-ख्वाही' की गई।।

मुद्दतों के बाद गर जो यूँ बात की गई।।

खामियां जता के ही गात फिर भरी गई।।

गर दो'-आब की पवन,रोंक लें ये खिड़कियां ।

रूह चंद दिवारों के दरमियाँ सिली गई।।

गर कहूँ जो' उनकी' तो साफ़ लफ़्ज हैं यही।

रात-ओ-दिन युँ आदतन हमसे बात की गई ।।

बिन पढ़े किताब -ए- दिल ,ग़र हिंसाब कर दिया ।।

तो दरख़्ती' जिंदगी क़त्ल ही तो की…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on March 22, 2019 at 10:30am — 1 Comment

कोई ऐसे रूठता है क्या

122-1212-22

.

कोई रोकने लगा है क्या  ?

कोई राज दरमियां है क्या?

तेरा फोन अब नहीं आता!!

कोई और मिल गया है क्या ?

मुझे गैर कह दिया तुमने!!

मेरा वास्ता बुरा है क्या ?

मेरे रूबरू नहीं रहते!!

मेरा साथ बददुआ है क्या?

तू ही खैरख्वाह बस मेरा!!

तू भी आजकल खफा है क्या?…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on March 17, 2019 at 9:00pm — 1 Comment

मन की मनमानी को ठुकराने लगे हैं ..

2122-2122-2122

वक्त से दो चार हो जाने लगे हैं।।

मन की मनमानी को ठुकराने लगे हैं।।

अब जो अरमानों को टहलाने-लगे* हैं।।(बहाने बाजी करना)

जीस्त की सच्चाई अपनाने लगे हैं।।

उम्र की दस्तक़ जो है चहरे प मेरे।

श्वेत होकर केश लहराने लगे हैं।।

बचपना अब रूठता सा जा रहा है ।

पौढ़पन* अब अक्श दरसाने लगे हैं।।

मंजिलों में जिनके परचम दिख रहे उन।

सब के तर* पे शाल्य* मनमाने लगे हैं।।( निचला हिस्सा,…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on March 16, 2019 at 1:21pm — 4 Comments

जाने क्या कह रहा है मेरा आज मन ..गीत



शीत जैसी चुभन, आग जैसी जलन।।

जाने क्या कह रहा है मेरा आज मन।।

इक कशिश पल रही है हृदय में कहीं।

कश्मकश चल रही , साथ मेरे कोई।।

डुबकियां ले रहा ही मेरा आज मन।।

इस कदर है अधर से अधर का मिलन।।

जैसे पुरवा पवन छू रही हो बदन।।..१

जाने क्या कह रहा है .....

गर हूँ तन्हा मेरे साथ तन्हाई है।

भीड़ के साथ हूँ तो ये रूसवाई है।

दौड़कर पास आना लिपटना तेरा।।

मेरे आगोश में यूँ सिमटना तेरा।।

यूँ लगे जैसे मिलतें हो धरती…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on March 12, 2019 at 10:48am — 2 Comments

मन भी कितना आतुर है ..

22-22-22-2

मन भी कितना आतुर है।।

ज्यूँ सबकुछ जीवन भर है।।

पशुओं  कि यह हालत भी।

इंसानों से बेहतर है।।

लोक समीक्षा इतनी ही।

जितना चिड़िया का पर है।।

मेरा मेरा मुझको ही।

छाया है सब छप्पर है।।

कितना तुम अब भागोगे ।

तीन-कदम* पर ही घर है।।(बचपन जवानी बुढ़ापा)

खूब बड़े बन जाओ क्या…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on March 11, 2019 at 2:49pm — 3 Comments

मैं वक्त कहाँ कब रुकता हूँ .

22-22-22-22

मैं कुछ और कहाँ कहता हूँ।।
गैरों से लिपटा - अपना हूँ।।

वैमनष्यता न सर उठा पाए।
दुश्मन की तरहा रहता हूँ।।

दरपण भी छू सकता है क्या।
बस ये ऐसे ही - पूछा हूँ।

कलियाँ खुशबू बिखरायेंगी।
मैं वक़्त कहाँ कब रुकता हूँ।।

आमोद रखो, बिश्वास रखो।
पग पग जीवन में अच्छा हूँ।।


..अमोद बिंदौरी / मौलिक अप्रकाशित

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 10, 2019 at 11:30am — 5 Comments

सच की झूठी जिल्दकारी क्या करूँ ..

2122-2122-212

याद आती है तुम्हारी क्या करूँ ।।

छाई रहती है खुमारी  क्या करूँ।।

अब नहीं चलता , मेरे पे बस मेरा।

बढ़ रही नित बेक़रारी क्या करूँ।।

खुद मुआफ़िक आयत ए कुरआन हो।

इसमें अच्छी अर्श कारी क्या करूँ।।

झूठा' सिक्का अब चलन बाजार का

सच की झूठी जिल्दकारी क्या करूँ।।

हर्ज़ कोई बात से…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on March 9, 2019 at 3:30pm — 4 Comments

कोई उम्मीद का सूरज कहीं पर है खड़ा सायद

1222-1222-1222-1222

जो नजरें अब तलक बेख़ौफ़ दौड़ी जा रहीं हैं यूँ।।

कई आशाएं तपती रेत को खंघला रहीं हैं यूँ।।

कोई उम्मीद का सूरज , कहीं पर है खड़ा सायद।

पहल की किरने ये पैग़ाम लेकर आ रहीं हैं यूँ।।

ये सन्नाटा जो पसरा चीख़ के कुछ अंश बांकी हैं।

दिशाएँ इंतक़ाम-ए-जंग को दुहरा रहीं हैं यूँ।।

विषमता में खड़ी हो लोकधर्मी जंग लड़कर अब।

रिसाल ए रौशनाई हौसले उमड़ा रहीं हैं यूँ।।

कोई तो लिख रहा बेशक नया भारत किताबों में।…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on March 6, 2019 at 7:39pm — 1 Comment

अहसास होगा याद अगर करते हैं

2212-22-1122-22

अहसास होगा याद अगर करते हैं।।

आती है क्यूँ चाहत, के क्यूँ घर करते हैं।।

इस आस से की कल कुछ अच्छा होगा।

हम लोग इक दिन और सफर करते हैं।।

मैंने भी अक्सर नाम लिये बिन लिख्खा।

जज्बात ए दिल बेनाम सफर करते हैं।।

ये आपकी आहट ही कुरेदेगी घर को।

जो छोड़ जाना आप नज़र करतें हैं।।(पेश करना)…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on March 4, 2019 at 12:30pm — 4 Comments

यूँ इश्क का इक सुकून हूँ मैं..

121-22-121-22

नये ज़माने का खून हूँ मैं।।

पुराने स्वेटर का ऊन हूँ मैं।।

मुझे न पढ़ना न पढ़ सकोगे।

मैं अहदे उल्फ़त* जुनून हूँ मैं। time of love

अजब! सिफारिश मेरी करोगे।

अभी भी शक है कि कौन हूं मैं।।

करोगे क्या मेरे ज़ख्म सी कर।

यूँ इश्क का इक सुकून हूँ मैं।।

मकान मेरा नहीं है गुम सा।

पुराने घर से दरून* हूँ मैं।। (दिल,मध्य कोर)

के हिज्र हो या विसाल तेरा।

हूँ दोनों शय में…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on February 13, 2019 at 11:52pm — 3 Comments

सुन! जो उनसे हो मुलाकात जाये तो क्या होगा

बह्र-

2122-2122-1221-222

सुन! जो उनसे हो मुलाकात जाये तो क्या होगा ।।

दरमियाँ फिर हो वही बात जाये तो क्या होगा।।

पर कहीं वो रूठ कर नजरें अपनी घुमा ली तो ।

बेबजह यूँ इश्क जजबात जाये तो क्या होगा।।

छोड़ उसको फिर न ये दर्द उलफत का देना अब।

रो के गर उसकी भी ये रात जाये तो क्या होगा।।

जानते हो ,वो यूँ मीलों सफर के जैसा है।

दो कदम चल के मुलाकात जाये तो क्या होगा ।।

मुझसे वो अच्छे से मिलना नहीं चाहती…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on February 7, 2019 at 6:37pm — 4 Comments

वही उग आऊंगा मैं भी , अनाजों की तरह ..

बह्र 

1222-1222-1222-12

चलो हमदर्द बन जाओ, ख़यालों की तरह।।

कोई खुश्बू ही बिखराओ गुलाबों की तरह।।

बहुत थक सा गया हूँ जिंदगी से खेल कर।

कजा आगोश में भर लो दुशालों की तरह।।

मुझे बंजर में नफरत से कहीं भी फेंक दो।

वही उग आऊंगा मैं भी, अनाजों की तरहा।।

मुझे पढ़ना अगर चाहो तो पढ़ लेना यूँ ही ।

हुँ यू के जी के बस्ते में, किताबों की तरह।।



मेरी तुलना न कर उल्फ़त, गुलों की बस्ती' से।

मैं काफिर मैकदे में…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on January 20, 2019 at 7:00am — 1 Comment

मेरे घर अब उजाला बन के मुझमे कौन रहता है

बह्र 1222-1222-1222-1222

बता हर सिम्त तेरा बनके मुझमें कौन रहता है।।

तुझे लेकर अकेला बनके मुझमे कौन रहता है।।

अगर अब मुस्कुराते हो मेरी जद्दोजहद से तुम।

तो बोलो आज तुम सा बनके मुझमें कौन रहता है।।

तुम्हारा प्यार, तुम सा यार तेरी यादें वो सारी।

भुला हर कुछ अवारा बनके मुझमे कौन रहता है।।

गरीबी के दिये सा गर्दिशों में भी मैं जगमग हूँ।

मेरे घर अब उजाला बन के मुझमें कौन रहता है।।

बहा कर खत तेरे सारे यूँ गंगा के…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on January 17, 2019 at 6:35pm — 2 Comments

है बहुत कहने को लेकिन अब तो चुप बहतर है।।

बह्र- 2122-2122-2122-22

है बहुत कहने को लेकिन अब तो चुप बहतर है।।

जो समझ पाए न तुम क्या फायदा कहकर है।।

शोर कितना ही मचाये, या करे अब बकझक।

मैं समझ लेता हूँ मेरा दिल भी इक दफ्तर है।।

खुश नशीबी है मेरी नफ़रत मुहब्बत जंग की।

हार कर भी जीतने जैसा ही इक अवसर है।।

अब मैं ढक लेता हूँ  खुद-का ये बदन अच्छे से।

अब नहीं मैं पहले जैसा गन्दगी अंदर है।।…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on December 23, 2018 at 3:01pm — 2 Comments

बहुत पछतायेगा वो मेरा पता पा कर - ग़ज़ल

बह्र - 1222-122-2212-22

कोई यूँ खुश हुआ हो अपना खुदा पाकर।।

बहुत पछताएंगे वो मेरा पता पाकर।।

सफर चलना है कैसे ,लेकर चलन कैसा।

उन्हें अहसास होगा ,आबोहवा पाकर।।

वो अपनी ज़द में ही अपना आशियाँ चुन लें ।

कहाँ होता है आदम से बा वफ़ा पाकर।।

मुझे अब मुल्क़ से ये मजहब ही निकालेगा ।

बहुत खुश है मुझे यह जलता हुआ पा कर ।।

मैं अपनी आरजू अब अपना कहूँ कैसे ।

ये तो खुश है मेरे बच्चों से दगा पा कर…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on October 18, 2018 at 7:29pm — No Comments

मैं बहुत कुछ सोंचता रहता हूँ पर कहता नहीं

बह्र- 2122-2122-2122-212



ज्यों हवा दस्तक करे खटखट कोई होता नहीं।।

मैं बहुत कुछ सोंचता रहता हूँ पर कहता नहीं।।



इस तरह परछाई सा महसूस होता वो मुझे।

जैसे कोई दरमियाँ अपने है पर दिखता नहीं।।



हर बुढ़ापा रात भर कुछ खोजता है जाने क्या

नींद में भी जागता रहता है क्यों सोता नहीं ।।



चौक में करता नुमाइश ,वक्त भी दल्ला हुआ।

एक झटके में मुझे क्यों नग्न कर देता नहीं।।



इक समंदर कैद है आँखों में अपने दर्द का ।

जो भरा रहता है अंदर,पर… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on October 7, 2018 at 11:06pm — 4 Comments

है सच के नींद बड़ी मुश्किलों से आती है

बहर

 1212-1122-1212-22

मेरे खयाल में अब फासलों से आती है।।

तुम्हारी याद भी अब दूसरों से आती है।।

कदम रुके हैं मुहब्बत की राह में जबसे।

है सच के नींद बड़ी मुश्किलों से आती है।।

की जर्रा जर्रा कही टूट कर है बिखरा यूँ।

सदा ये आज मेरी महफिलों से आती है।।

मसल चुका हुँ सभी कुछ मैं जह्न के भीतर।

अभी भी तेरी कसक , हौसलों से आती है।।

गुजर रही है मुहब्बत की तिश्नगी दे कर।

जो…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on September 13, 2018 at 9:30pm — 5 Comments

बस है कोशिश उड़ूँ कुतरे पर ले

बह्र - 2122-1221-22

इतना उलझा है आदम बसर में।।
खुद से पूछे वो है किस सफर में ।।

क्या समझ पाएगे रात भर में।।
फर्क है इस नजर उस नजर में।।

ना बदल पाऊं बिलकुल न बदले।
पर है कोशिश उड़ूँ कुतरे पर में।।

अपनी मंजिल से है लापता जो ।
चीखता फिर रहा, रह-गुजर में।।

हर मुसाफिर की कोशिस यही बस।
सब सलामत रहे मेरे घर में।।

आमोद बिन्दौरी /मौलिक- अप्रकाशित

Added by amod shrivastav (bindouri) on September 7, 2018 at 8:30pm — 3 Comments

घर के सपने संजो अधभरा ठीक हूँ।।

बह्र-212-212-212-212



घर पे अपने बुरा या भला ठीक हूँ।।

गुमशुदा हूँ अगर गुमशुदा ठीक हूँ।।

पर्त धू की चढ़ी,दीमकों का बसर।

हो लगी चाहे सीलन पता ठीक हूँ।।

मेरा लहजा है कोई कहे न कहे।

मैं रदीफ़ ए ग़ज़ल काफिया ठीक हूँ।।

ठाठ की टोकरी या तुअर झाड़ की ।

घर के सपने संजो अधभरा ठीक हूँ।।

शान ओ शौक़त न कोई बसर चाहिए।

बस है चादर फटी अध-ढका ठीक हूँ।।

.

आमोद बिन्दौरी…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on August 18, 2018 at 5:00pm — 4 Comments

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