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सरसी छंद - "अरुणोदय"

1-
धीरे-धीरे आसमान का, रंग हो रहा लाल।
अतिमनभावन दृश्य सुहावन,है अरूणोदय काल।।
पसरा था जो गहन अँधेरा, अब तक चारों ओर।
उसे चीरकर आयी देखो, प्राणदायिनी भोर।।
2-
नवप्रभात ने फूँक दिए ज्यों, सकल सृष्टि में प्राण।
मंगलमय हो गया सबेरा, मिला तिमिर से त्राण।।
जलनिधि की जड़ता का जैसे, किया सूर्य ने अंत।
जीव-जंतु जड़-जंगम जलधर, हुए सभी जीवंत।।
3-
सागर की गहराई में भी, जीवन है संगीन।
घड़ियालों के बीच वहाँ पर, प्राण बचाती मीन।।
सूरज के आ जाने से अब, उड़गन हुए मलीन।
रणभेरी सुनकर ही जैसे, भाग रहे बलहीन।।
4-
नीड़ों से निकले हैं पंछी, करते कलरव गान।
पंख पसारे आसमान में, आया नवल विहान।।
सूरज के आने से पुलकित,धरा और आकाश।
जिसने बिखराई है आभा,करके तम का नाश।।
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
**हरिओम श्रीवास्तव**

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Comment by Hariom Shrivastava on March 15, 2019 at 9:37am
  1. आदरणीय सौरभ पाण्डे जी,रचना पर आपकी उपस्थिति व सुंदर समीक्षात्मक प्रतिक्रिया पाकर मैं अभिभूत हूँ; सृजन सार्थक हुआ। तहेदिल से आपका शुक्रिया।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 14, 2019 at 5:15pm

आदरणीय हरिओम जी, आपकी सरसी छंद में निबद्ध रचनाएँ मनभावन बन पडी हैं. अरुणॊदय की वेला का मनहारी वर्णन हुआ है. 

हार्दिक बधाइयाँ 

Comment by Hariom Shrivastava on March 14, 2019 at 10:53am

आदरणीय सुरेन्द्र इंसान जी,आपकी उपस्थिति व उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया से सृजन सार्थकता हुआ। हार्दिक आभार।

Comment by Hariom Shrivastava on March 14, 2019 at 10:52am

आदरणीय समर कबीर साहब,आपकी उपस्थिति व उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया से सृजन सार्थकता हुआ। हार्दिक आभार।

Comment by surender insan on March 13, 2019 at 7:47pm

वाह जी वाह बहुत अच्छे सरसी छंद लिखे आपने ।बहुत बहुत बधाई। सादर नमन जी।

Comment by Samar kabeer on March 12, 2019 at 11:51am

जनाब हरिओम श्रीवास्तव जी आदाब,अच्छे सरसी छन्द लिखे आपने,बधाई स्वीकार करें ।

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