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एक ग़ज़ल रुबाइ की बह्र में

मफ़ऊल मफ़ाईल मफ़ाईल फ़अल

221     1221   1221    12

पाना जो शिखर हो तो मेरे साथ चलो

ये अज़्म अगर हो तो मेरे साथ चलो

दीवार के उस पार भी जो देख सके

वो तेज़ नज़र हो तो मेरे साथ चलो

होती है ग़रीबों की वहाँ दाद रसी

तुम ख़ाक बसर हो तो मेरे साथ चलो

पत्थर पे खिलाना है वहाँ हमको कँवल

आता ये हुनर हो तो मेरे साथ चलो

हर शख़्स वहाँ कड़वा करेला है "समर"

लहजे में शकर हो तो मेरे साथ चलो

"समर कबीर"

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Samar kabeer on December 5, 2019 at 4:59pm

बहुत शुक्रिय: मंजू सक्सेना जी ।

Comment by Manju Saxena on December 5, 2019 at 1:12pm

बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल... कबीर सर

Comment by Samar kabeer on November 26, 2019 at 5:17pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिय: ।

Comment by Sushil Sarna on November 26, 2019 at 4:07pm

पाना जो शिखर हो तो मेरे साथ चलो

ये अज़्म अगर हो तो मेरे साथ चलो

दीवार के उस पार भी जो देख सके

वो तेज़ नज़र हो तो मेरे साथ चलो
वाह आदरणीय बेहद खूबसूरत अहसासों से सजी इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए दिल बधाई कबूल फरमाएं सर।

Comment by Samar kabeer on July 20, 2019 at 12:10pm

जनाब अजय तिवारी जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

// इस बह्र में मीर की सिर्फ एक ग़ज़ल है और मीर के बाद पुराने लोगों में सिर्फ़ फ़ानी ने इसमें हाथ आजमाए हैं.//

इस जानकारी के लिए अलग से धन्यवाद ।

Comment by Ajay Tiwari on July 20, 2019 at 10:31am

आदरणीय समर साहब, खूबसूरत ग़ज़ल हुई है. इस बह्र में मीर की सिर्फ एक ग़ज़ल है और मीर के बाद पुराने लोगों में सिर्फ़ फ़ानी ने इसमें हाथ आजमाए हैं. हार्दिक बधाई.

Comment by Samar kabeer on April 28, 2019 at 6:15pm

जनाब लक्ष्मण धामी जी आदाब,ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।

Comment by Samar kabeer on April 28, 2019 at 6:13pm

जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह जी आदाब,ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 28, 2019 at 4:24pm

आ. भाई समर जी, इस शानदार गजल के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on April 28, 2019 at 2:43pm

आद0 समर कबीर साहब सादर प्रणाम। 

हर शख़्स वहाँ कड़वा करेला है "समर"

लहजे में शकर हो तो मेरे साथ चलो।।

वाह वाह वाह वाह, क्या कहना

दीवार के उस पार भी जो देख सके

वो तेज़ नज़र हो तो मेरे साथ चलो।।

बेमिशाल शैर वाह वाह

होती है ग़रीबों की वहाँ दाद रसी

तुम ख़ाक बसर हो तो मेरे साथ चलो।।

आपकी सोच को नमन, बहुत खूब!

सचमुच एक बेहतरीन ग़ज़ल पढ़ने को मिली। शैर दर शैर दाद के साथ बधाई कुबुल कीजिये। सादर

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