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ग़ज़ल- बलराम धाकड़ (मुहब्बत के सफ़र में सैकड़ों आज़ार आने हैं)

1222 1222 1222 1222
मदारिस हैं, मसाजिद, मैकदे हैं, कारख़ाने हैं।
हमारी ज़िन्दगी में और भी बाज़ार आने हैं।
ये लावारिस से पौधे बस इसी अफ़वाह से खुश हैं,
जताने इख़्तियार इन पर भी दावेदार आने हैं।
मैं मरना चाहता हूँ और वो कहते हैं जीता रह,
उन्हीं का हुक़्म मेरी धड़कनें हर बार माने हैं।
दुःशासन, कर्ण, अर्जुन, कृष्ण, शकुनि, द्रोण के जैसे,
अभी तेरी कहानी में कई किरदार आने हैं।
चलन पर वो हमारे देखिए, तनक़ीद करते हैं,
कि जिनकी कीमतें ख़ुद ही के घर में चार आने हैं।
अभी इस दर्द, आँसू और घुटन को पेशगी समझो,
मुहब्बत के सफ़र में सैकड़ों आज़ार आने हैं।
बहार आने को है, बारूद की ख़ुश्बू फ़ज़ा में है,
यही बाकी है शाख़ों पे भी अब अँगार आने हैं।
मौलिक/अप्रकाशित ।

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Comment

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Comment by Balram Dhakar on February 2, 2019 at 11:38am

बहुत बहुत शुक्रिया, आदरणीय लक्ष्मण जी।

सादर।

Comment by नाथ सोनांचली on February 2, 2019 at 6:44am

आद0 बलराम जी सादर अभिवादन। अच्छी ग़ज़ल कही आपने। शैर दर शैर दाद के साथ बधाई देता हूँ। 

Comment by Samar kabeer on February 1, 2019 at 9:37pm

जनाब बलराम धाकड़ जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'मदरसे, मस्जिदें हैं, मैक़दे हैं, कारख़ाने हैं'

इस मिसरे में सहीह शब्द है "मद-रसे"और इसका वज़्न 212 है,इसी तरह 'मस्जिद' का बहुवचन "मसाजिद" होता है,इस मिसरे को यूँ कर सकते हैं:-

'मदारिस हैं,मसाजिद,मैकदे हैं कारख़ाने हैं'

'ये लाबरिस से पौधे बस इसी अफ़वाह से खुश हैं'

इस मिसरे में 'लाबरिस' को "लावारिस" कर लें,एक जानकारी और देना चाहूँग़ा कि देवनागरी के हिसाब से इस मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर है,लेकिन उर्दू के हिसाब से नहीं है ।

'जताने अख़्तियार इन पर भी दावेदार आने हैं'

इस मिसरे में 'अख़्तियार' को "इख़्तियार" कर लें ।

'उन्हीं का हुक़्म मेरी धड़कनें हर बार माने हैं'

इस मिसरे में 'धड़कनें' बहुवचन है,इस हिसाब से 'माने'  की जगह क़ाफ़िया "मानें" हो रहा है,ग़ौर करें ।

'हमारे चाल चलनों पर वो अब तनक़ीद करते हैं'

इस मिसरे में 'चलनों' शब्द उचित नहीं इस मिसरे को आप चाहें तो यूँ कर सकते हैं:-

'चलन पर वो हमारे,देखिये तनक़ीद करते हैं'

बाक़ी शुभ शुभ ।

'अभी तलवार आई है, अभी सरशार आने हैं'

इस मिसरे में आपने 'सरशार' का क्या अर्थ लिया है?

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 1, 2019 at 5:56am

आ. भाई बलराम जी, बेहतरीन गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

कृपया ध्यान दे...

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