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1222 1222 1222 1222

तरन्नुम बन ज़ुबाँ से जब कभी निकली ग़ज़ल कोई ।
सुनाता ही रहा मुझको मुहब्बत की ग़ज़ल कोई ।।

बहुत चर्चे में है वो आजकल मफ़हूम को लेकर ।
जवां होने लगी फिर से पुरानी सी ग़ज़ल कोई ।।

कभी यूँ मुस्कुरा देना कभी ग़मगीन हो जाना ।
वो छुप छुप कर तुम्हारी जब कभी पढ़ती ग़ज़ल कोई ।।

तुम्हें देखा जो मैंने और बाकी शेर कह डाला ।
हुई है बाद मुद्दत के यहाँ पूरी ग़ज़ल कोई ।।

सुना देने की बेचैनी दिखी है उसके चेहरे पर ।
किसी की याद में जो रात भर लिक्खी ग़ज़ल कोई ।।

हजारों लफ्ज़ भी कमतर लगे क्या क्या लिखूँ तुम पर ।
तुम्हारे हुस्न की तारीफ़ में बहकी ग़ज़ल कोई ।।

यहाँ दीवानगी की हद से गुज़रा है ज़माना तब ।
हमारे साज़ पर जब जब तेरी सजती ग़ज़ल कोई ।।

अरुजी से कहा मैंने है क्वाफी बह्र क्या सब कुछ ।
जिग़र का खून भी लगता है तब ढ़लती ग़ज़ल कोई ।।

         डॉ नवीन मणि त्रिपाठी
         मौलिक अप्रकाशित












































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Comment by PHOOL SINGH on January 10, 2019 at 12:05pm

"नवीन भाई" अतिसुन्दर रचना बधाई स्वीकारें

Comment by Md. anis sheikh on January 7, 2019 at 8:27pm

वाह बहुत खूब नवीन मणि त्रिपाठी जी बहुत अच्छी ग़ज़ल है हर शेर इक मिठास लिए हुए है 

Comment by Samar kabeer on January 7, 2019 at 11:45am

जनाब डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'कभी यूँ मुस्कुरा देना कभी ग़मगीन हो जाना'

इस मिसरे को यूँ कर लें,गेयता बढ़ जाएगी:-

'कभी तो मुस्कुराती है,कभी ग़मगीन होती है'

'तुम्हें देखा जो मैंने और बाकी शेर कह डाला'

इस मिसरे को यूँ कर लें:-

'तुम्हें देखा जो मैंने और बाक़ी शैर कह डाले'

'अरुजी से कहा मैंने है क्वाफी बह्र क्या सब कुछ''

ये मिसरा लय में नहीं है,यूँ कर लें:-

'अरुजी से कहा मैंने, क़वाफ़ी बह्र से पहले'

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