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हुस्न कोई नूरानी है


22 22 22 2


शायद    वह    दीवानी   है ।
लड़की   जो  अनजानी  है ।।

दिलवर से मिलना है क्या ।
चाल   बड़ी   मस्तानी  है ।।

इश्क़  हुआ है क्या  उसको ।
आँखों    में   तो   पानी  है ।।

खोए    खोए    रहते    हो ।
यह   भी   इक  नादानी  है ।।

शमअ पे  तो परवानों  को।
हँसकर  जान  गवानी  है।।

उंगली उस पर खूब उठी ।
रिश्ता  क्या  जिस्मानी  है ।।

चर्चा   जोरों  पर  उसकी ।
कैसी  अजब  जवानी  है ।।

जिस पर नज़रें टिकती हैं ।
हुस्न   कोई   नूरानी   है ।।

दर्दो   ग़म    में    जीता   हूँ ।
मेरे   पास    निशानी     है ।।

जिनकी ख़ातिर कलम चली ।
उनको   ग़ज़ल  सुनानी    है ।।

जाते हो क्यो महफ़िल से ।
छा   जाती    वीरानी   है ।।

कसमें  खाना छोड़ो जी ।
तुमको कहाँ निभानी है ।।

चेहरा पढ़ कर  कहता  हूँ ।
लम्बी  लिखी  कहानी  है ।।

ज़िस्म के पिजरे से इक़ दिन।
चिड़िया तो उड़ जानी है ।।

        डॉ नवीन मणि त्रिपाठी
        मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Md. anis sheikh on January 7, 2019 at 8:18pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब बहुत  अच्छी ग़ज़ल हुई है बहुत बहुत बधाई आपको 

Comment by Naveen Mani Tripathi on January 7, 2019 at 5:48pm

आ0 कबीर सर सादर के साथ हार्दिक आभार 

Comment by Samar kabeer on January 7, 2019 at 11:50am

जनाब डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'जाते हो क्यो महफ़िल से'

इस मिसरे को यूँ कर लें:-

'जाते हो जब महफ़िल से'

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