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"अज़ीम शख़्स की दास्तां"

जब वो कहता है तो वो कहता है 

रोक पाता नहीं उसे कोई , 

उसके आगे ना रंक, राजा है , 

कंठ में कोयल सा उसके वासा है ॥ 

जब भी कहता है सच ही कहता है 

जैसे बच्चा हृदय में रहता है , 

उसके जैसा नहीं कोई सानी , 

वो भी लिखता है पानी पे पानी ॥ 

धार शब्दोँ की उसकी तीखी है , 

जानता है वो जिसपे बीती है 

कह के उसको क्या तुम बुलाओगे , 

तुम ना समझे हो ना समझ पाओगे ॥ 

उसपे मर्ज़ी चलाना मुश्क़िल है, 

झूठ के पांव पाना मुश्क़िल है , 

कोशिशें सब नाकारा कर देगा , 

तुमको इंसानियत से भर देगा ॥ 

बरसों में शख़्स ऐसा होता है,  

बीज उल्फ़त के भू में बोता है,  

आओ हम उसका एहतिराम करें,  

ज़ीस्त में कोई तो भला काम करें ॥ 

-प्रदीप देवीशरण भट्ट -

रचना मौलिक व अप्रकाशित है 

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Comment by Pradeep Devisharan Bhatt on February 5, 2019 at 11:45am

सुरेंद्र जी धन्यवाद

Comment by Pradeep Devisharan Bhatt on February 5, 2019 at 11:44am

शुक्रिया महेंद्र जी

Comment by Samar kabeer on January 8, 2019 at 12:00pm

महब्बत है आपकी,सलामत रहो ।

Comment by Mahendra Kumar on January 7, 2019 at 8:36pm

बहुत ख़ूब सर! आपने तो कमाल कर दिया. इसको कहते हैं उस्ताद. दण्डवत प्रणाम है आपको. यही चीज़ है जो हम सबको अपने मिसरों में लानी चाहिए. बहुत-बहुत धन्यवाद सर. सादर.

Comment by Samar kabeer on January 7, 2019 at 8:30pm

महेन्द्र जी,

'धार शब्दोँ की उसके तीखी है'

"उसके शब्दों की धार तीखी है"--और स्पष्ट हो गया न?

Comment by Mahendra Kumar on January 7, 2019 at 7:59pm

आदरणीय प्रदीप देवीशरण भट्ट जी, अच्छी रचना हुई है. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. 

//धार शब्दोँ की उसके तीखी है//

सादर.

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on January 7, 2019 at 9:05am

आद0 प्रदीप देवीशरण भट्ट जी सादर अभिवादन। बढ़िया रचना हुई है, कुछ टंकण त्रुटियों को देख लें। इस रचना पर मेरी बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by Samar kabeer on January 5, 2019 at 12:14pm

जनाब प्रदीप भट्ट जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

कोशिशें सब नकारा कर देगा'

इस पंक्ति में 'नकारा' को "नाकारा" कर लें ।

' आओ हम उसका अहतराम करें'

इस पंक्ति में 'अहतराम' को "एहतिराम" कर लें ।

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