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राखी पर कुछ कुण्डलिया

कच्चे धागों से जुड़ा, रक्षाबंधन पर्व
बहना बाँधे डोर जब, भैया करता गर्व
भैया करता गर्व, नेग बहना को देकर
प्रण जीवन रक्षार्थ, वचन खुश बहना लेकर
रेशम बाँधे प्रीत, सनातन रिश्ते सच्चे
बाँटे खुशी अपार, भले हैं धागे कच्चे।1।

सावन में बदरा घिरे, बहने लगी बयार
प्यार बाँटने आ गया, राखी का त्योहार
राखी का त्योहार, सजीं चहुओर दुकानें
ट्रांजिस्टर पर खूब, बजें राखी के गाने
जात धर्म से दूर, भाव है कितना पावन
बँधे स्नेह की डोर, मास आये जब सावन।2।

रचे ऋचाएँ स्नेह की, और मधुर उल्लास
रिश्तों के गठजोड़ को, राखी करती पास
राखी करता पास, दिलों के खोट मिटाकर
दुश्मन बनते दोस्त, पुरातन जंग भुलाकर
दीन दुुुखी के साथ, चलो यह पर्व मनाएँ
राखी का त्योहार, स्नेह की रचे ऋचाएँ।3।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by नाथ सोनांचली on August 30, 2018 at 1:03pm

आद0 रवि शुक्ल जी सादर अभिवादन। कुण्डलिया पर आपकी उपस्थिति और उत्साह बढ़ाती प्रतिक्रिया के लिए हृदय तल से आभार

Comment by नाथ सोनांचली on August 30, 2018 at 1:02pm

आद0 सौरभ पांडेय जी सादर नमन। आपकी प्रतिक्रिया पाकर मेरी रचना धन्य हो गयी। बहुत बहुत आभार आपका।

Comment by Ravi Shukla on August 29, 2018 at 4:55pm

आदरणीय सुरेंद्र नाथ जी राखी को केंद्र मानते हुए आपने अच्छी कुंडलिया कही इसके लिए हार्दिक बधाई प्रेषित है


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 29, 2018 at 12:03am

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ जी, आपकी कुण्डलिया के भाव सहज ही निरुपित हुए हैं. हार्दिक बधाई. 

Comment by Sushil Sarna on August 28, 2018 at 1:52pm

आदरणीय सुरेन्दर नाथ जी राखी के अवसर पर बहुत सुंदर कुण्डलिया का सृजन हुआ है। हार्दिक बधाई। 

Comment by नाथ सोनांचली on August 28, 2018 at 11:02am

आद0 समर साहब सादर प्रणाम। आपका बताया लब्ज ही सही और शुद्ध है । पुनः आभार

Comment by Samar kabeer on August 27, 2018 at 6:38pm

सुधार से पहले 'दीन दुखी' को कन्फ़र्म कर लें ।

Comment by नाथ सोनांचली on August 27, 2018 at 6:31pm

आद0 समर साहब सादर प्रणाम। आपकी बहुमुल्य टिप्पणी मुझे किसी ईनाम से कम नहीं। रचना पोस्ट करने के बाद सदैव आपकी टिप्पणी का इंतजार करता हूँ। आपका हृदय तल से आभार।

आवश्यक सुधार कर लेता हूँ। सादर

Comment by Samar kabeer on August 27, 2018 at 6:23pm

जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह जी आदाब,रक्षा बंधन के मौक़े पर बहुत अच्छे कुण्डलिया छन्द लिखे आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें,साथ ही आपको रक्षा बंधन की बधाई भी ।

'बाँटे खुसी अपार'

इस पंक्ति में 'खुसी' को "ख़ुशी" कर लें ।

'दिन दुखियों के साथ'

मेरे ख़याल से सहीह शब्द "दीन दुखी" है, कन्फ़र्म कर लें ।

Comment by नाथ सोनांचली on August 27, 2018 at 2:32pm

आद0 विजय निकोर जी सादर अभिवादन। प्रतिक्रिया द्वारा कविता को परितोषित करने के लिए कोटिश आभार

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