For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

कितनी ही बार वह प्रयास कर चुका था लेकिन झोला संभालने में वह अपने आप को असमर्थ पा रहा था. अपने आप पर उसे अब क्रोध आने लगा, क्या जरुरत थी पैदल आकर सब्जी खरीदने की. स्कूटर रहता तो कम से कम उसपर इसे रख तो लेता लेकिन अब करे? सब्जियों से ठसाठस भरा झोला उठाने में उसे वैसे ही बहुत कठिनाई हो रही थी और उस पर इसकी पट्टी को आज ही टूटना था.
अब घर कैसे जाए, झख मारकर उसने घर पर बेटे को फोन लगाया. बेटा भी मैच देखने में मगन था तो उसने भी टालते हुए कहा "अरे एक रिक्शा ले लीजिये और आ जाईये", और फोन रख दिया. बड़ी मुश्किल से झोले को जमीन पर अपने पैरों के पास उसने टिकाया और एक रिक्शे वाले को आवाज दी.
रिक्शे वाले ने झोले को रिक्शे पर रखा और उसको बैठाकर चल पड़ा. वह मन ही मन कुढ़ रहा था कि रिक्शे वाले ने उससे कहा "बिना पट्टी के झोले को भी ढोना कितना मुश्किल है न बाबूजी".
उसको याद आया, कल ही तो बाबूजी कह रहे थे "तुम लोग ही तो हमारा सहारा हो इस उमर में", और फिर उन्होंने अपना सर दूसरी तरफ घुमा लिया था.
झोले को घर में रखकर वह स्कूटर लेकर तुरंत बाबूजी के पास निकल पड़ा, पीछे से आती पत्नी की आवाज "अरे, अब कहाँ चल दिए" का जवाब देना उसने उचित नहीं समझा.


मौलिक एवम अप्रकाशित

Views: 108

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by विनय कुमार on August 18, 2018 at 3:55pm

बहुत बहुत आभार आ समर कबीर साहब

Comment by विनय कुमार on August 18, 2018 at 3:55pm

बहुत बहुत आभार आ शेख शहज़ाद उस्मानी साहब

Comment by Samar kabeer on August 18, 2018 at 12:16pm

जनाब विनय कुमार जी आदाब,अच्छी लघुकथा हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on August 17, 2018 at 3:20pm

बेहतरीन यथार्थपूर्ण, कटाक्षपूर्ण व प्रेरक विचारोत्तेजक सृजन।.हार्दिक बधाइयाँ आदरणीय विनय कुमार साहिब।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

राज़ नवादवी commented on Naveen Mani Tripathi's blog post कौन कितना है मदारी जानते हो
"आदरणीय समर कबीर साहब/ नवीन मणि त्रिपाठी जी, मुझे स्पष्टता प्रदान करने के लिए हार्दिक आभार.…"
10 hours ago
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post कौन कितना है मदारी जानते हो
"आ0 समर कबीर सर सादर नमन के साथ आभार । आ0 राज नावादवी साहब तहे दिल से शुक्रिया । आप से सहमत हूँ ।…"
10 hours ago
Samar kabeer commented on Ashish Kumar's blog post ग़ज़ल - 01
"' जिंदगी में छा गया है अब अमावस सा अँधेरा' ऐब…"
10 hours ago
Ashish Kumar commented on Ashish Kumar's blog post ग़ज़ल - 01
"आदरणीय समर कबीर जी नमस्कार,आपका बहुत बहुत आभार कि आपने गजल की समीक्षा की और त्रुटियाँ बताई।मैंने…"
12 hours ago
Samar kabeer commented on Naveen Mani Tripathi's blog post कौन कितना है मदारी जानते हो
"// इस शेर में चूँकि 'मैंने' या 'हमने' छुपा है, और गुज़ारना'…"
14 hours ago
राज़ नवादवी commented on Naveen Mani Tripathi's blog post कौन कितना है मदारी जानते हो
"आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी एवं जनाब समर कबीर साहब, मेरी एक शंका है,  झपकियों पर क्यूँ उठी…"
14 hours ago
राज़ नवादवी commented on Naveen Mani Tripathi's blog post कौन कितना है मदारी जानते हो
"आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी एवं जनाब समर कबीर साहब, मेरी एक शंका है,  झपकियों पर क्यूँ उठी…"
14 hours ago
राज़ नवादवी commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ८३
"आदरणीय नरेन्द्र सिंह चौहान साहब, आदाब अर्ज़ है. ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफज़ाई का तहे दिल से…"
14 hours ago
राज़ नवादवी commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ८३
"आदरणीय लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर, आदाब अर्ज़ है. ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफज़ाई का तहे दिल से…"
14 hours ago
राज़ नवादवी commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ८५
"आदरणीय समर कबीर साहब, आदाब अर्ज़ है. ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया.…"
14 hours ago
Samar kabeer commented on Naveen Mani Tripathi's blog post कौन कितना है मदारी जानते हो
"जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।"
14 hours ago
Samar kabeer commented on Rahul Dangi's blog post ग़ज़ल-बेहयाई दफ़्न कर देगी किसी की शायरी।
"जनाब राहुल डांगी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । ' काँच के टुकडों में…"
14 hours ago

© 2018   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service