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तन्हा तन्हा रहता हूँ,
मैं भी साये जैसा हूँ।

खाली मौसम होता है,
तुम बिन जब मैं होता हूँ।

मैंने तुमको अपना माना
मैं भी देखो कैसा हूँ।

उसकी आंखें बादल है
मैं भी भीगे रहता हूँ।

चुपके से सुन लेना तुम
जो भी तुमसे कहता हूँ।

जाने वालों जाओ तुम
अब थोड़ी मैं रोता हूँ।

अपनी सूखी आंखों में
अब भी सपने बोता हूँ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Rakshita Singh on June 27, 2018 at 1:39pm

आदरणीय सार्थक जी नमस्कार

सुन्दर पंक्तियों पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।।

Comment by Mahendra Kumar on June 26, 2018 at 10:17am

अच्छी ग़ज़ल है आदरणीय सार्थक जी। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। सादर। 

Comment by Samar kabeer on June 25, 2018 at 11:39am

जनाब सार्थक जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'मैं भी भीगे रहता हूँ'

इस मिसरे पर कुछ विचार करें।

Comment by रोहित डोबरियाल "मल्हार" on June 24, 2018 at 8:56pm
Comment by Mohammed Arif on June 23, 2018 at 9:10pm

प्रिय सार्थक जी आदाब,

                  बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल । दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें । गुणीजनों की बातों का संज्ञान  लेंं ।

Comment by gumnaam pithoragarhi on June 23, 2018 at 6:18pm

वाह बहुत खूब ग़ज़ल हुई है....... छोटी बह्र में खूब कहा है।।

Comment by Ravi Shukla on June 23, 2018 at 6:14pm

आदरणाीय साथर्क जी यद्यपि अापने गजल के अरकान नहीं  लिखें है  फिर भी बहरे मीर पर आपकी इस गजल के लिए बधाई स्वीकार करें । अच्छी गजल कही अापने ।

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