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ग़ुलामी बहुआयामी (अतुकान्त कविता)

डिजिटल ग़ुलामी है बहुआयामी
शारीरिक नुमाइश हुई बहुआयामी
हैरत है, कहें किसको नामी और नाकामी
अनपढ़, ग़रीब, शिक्षित या असामी।

योग ग़ज़ब के हो रहे वैश्वीकरण में
मकड़जाले छाते रहे सशक्तिकरण में
छाले पड़े आहारनलिकाओं में
ताले संस्कृति और संस्कारों में
अधोगति, पतन सतत् रहे बहुआयामी
हैरत है, कहें किसमें खामी और नाकामी
अनपढ़, ग़रीब, शिक्षित या असामी।

शिक्षा, भिक्षा, रक्षा सभी बहुआयामी
लेन-देन, करता-धरता, कर्ज़दाता भी बहुआयामी
आज़ादी, तानाशाही, राजनीति बदलें परिभाषायें
आशायें-निराशायें छायीं बहुआयामी
हैरत है, कहें किसको दानी और दामी
अनपढ़, ग़रीब, शिक्षित या असामी।

डिजिटल ग़ुलामी है बहुआयामी
योग, भोग और खेल बहुआयामी
हैरत है, कहें किसको नामी और नाकामी
अनपढ़, ग़रीब, शिक्षित या असामी।

डिजिटल ग़ुलामी है बहुआयामी
भत्ता-सत्ता-नुमाइश हुई बहुआयामी
हैरत है, कहें किसको नामी और नाकामी
अनपढ़, ग़रीब, शिक्षित या असामी।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by rajesh kumari on May 22, 2018 at 6:40pm

डिजिटल गुलामी है बहु आयामी ...वाह्ह्ह्ह बहुत अच्छी सार्थक रचना बहुत बहुत बधाई आद० उस्मानी जी 

Comment by Neelam Upadhyaya on May 22, 2018 at 2:15pm

बहुत ही बढ़िया।  बधाई स्वीकार करें। 

Comment by Mohammed Arif on May 21, 2018 at 12:18pm

आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,

                                     डिज़िटल आँधी ने सबकुछ तहस-नहस करके रख दिया है । हम सबकुछ भूल गए हैं । आपकी अबतक की सबसे अच्छी अतुकांत कविता । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Shyam Narain Verma on May 21, 2018 at 10:50am
वाह बेहद खूबसूरत प्रस्तुति … हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय।

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