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सागर जैसी लहर उठी है,

दिल की धड़कन में.

छलकी है पिय याद तुम्हारी,

मेरे नयनन में

 

तोड़े आम साथ में जाकर,

भायी मन अमराई.

पानी पर कागज की कश्ती,

हमने खूब चलाई.

 

खोयी हुई अभी तक हूँ मैं,

स्मृतियों के वन में.

 

छत पर चाँद निरखते बीतें,

रोज अकेले रतियाँ.

सखियाँ भी ससुराल गयीं सब,

कौन करे मधु बतियाँ.

 

नैन थके हैं पंथ निहारत,

सूने आँगन में.

 

जैसे-तैसे फागुन बीता,

झेली जेठ दुपहरी.

विरह अग्नि में तपते-तपते,

पिय, मैं हुई सुनहरी.

 

शीतल मंद फुहारें लेकर,

आना सावन में

"मौलिक एवं अप्रकाशित "

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 31, 2018 at 12:15pm
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 29, 2018 at 7:55pm

वाह आदरणीय शर्मा जी बहुत ही खूबसूरत सरस गीत हुआ..बहुत बहुत बधाई

Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 28, 2018 at 12:42pm

आदरणीया Anamika singh Ana जी आपका तहे दिल से शुक्रिया 

Comment by Anamika singh Ana on March 28, 2018 at 12:03pm

 वाह , वाह ..बहुत सुंदर 

छत पर चाँद निरखते बीतें,

रोज अकेले रतियाँ.

सखियाँ भी ससुराल गयीं सब,

कौन करे मधु बतियाँ.

 

नैन थके हैं पंथ निहारत,

सूने आँगन में.....

विरही मन की वेदना व मिलन की गुहार लिए बहुत सुंदर गीत रचने हेतु हार्दिक  बधाई स्वीकार  कीजिए ..सादर

Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 28, 2018 at 9:51am

आदरणीय Ajay Tiwari  जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 28, 2018 at 9:51am

आदरणीय  Samar kabeer जी आपका तहे दिल से शुक्रिया 

Comment by Ajay Tiwari on March 27, 2018 at 4:18pm

आदरणीय बसंत जी, इस सुरीले तोहफे के लिए. हार्दिक बधाई 

Comment by Samar kabeer on March 27, 2018 at 12:00pm

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,बहुत सुंदर गीत लिखा है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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