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दाग कितने नित लगाओगे वतन के भाल पर -- (गजल)-- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२ २१२२ २१२२ २१२


खूब नजरें  जो  गढ़ाये  हैं  पराये  माल पर
है भरोसा खूब उनको दोस्तो घड़ियाल पर।१।


भूख बेगारी औ'  नफरत है पसारे पाँव बस
अब भगत आजाद रोते हैं वतन के हाल पर ।२।


आज सम्मोहन  कला  हर नेता को आने लगी
है फिदा जनता यहाँ की हर सियासी चाल पर।३।


खुद  पहन  खादी  चमकते पूछता हूँ आप से
दाग कितने नित लगाओगे वतन के भाल पर।४।


ऐसा होता तो सुधर  जाते  सभी हाकिम यहाँ
वक्त जड़ता पर कहाँ है अब तमाचा गाल पर।५।


गाद  कचड़ा  और  बदबू  राज  करते  हैं  वहाँ
पंछियों की भीड़ रहती थी कभी जिस ताल पर।६।


गौर  करना  खूब  गहरे  कालिखों  से हैं  पुती
देश में नित उँगलियाँ जो उठ रही पड़ताल पर।७।


जिन  समाजों  में  बुरा  था घरजमाई बैठना
आज कब्जा है जमाई का वहीं ससुराल पर।८।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 16, 2018 at 6:27am

आ. भाई राम अवध जी, गजल पर उपस्थिति से उत्साहवर्धन के लिए आभार । बेहतरीन सुझाव के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on February 14, 2018 at 7:15pm

आदर्णीय लक्ष्मण धामी जी बहुत खूबसूरत ग़ज़ल आपने कहा है बधाई।

वक्त जड़ता पर कहाँ है अब तमाचा गाल पर

यहाँ 'पर' शब्द दो बार आने मिसरा खटक रह है। इसको ऐसा भी कहा जा सकता है

वक्त जड़ता ही नहीं अब तो तमाचा गाल पर। सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 13, 2018 at 7:55pm

आ. कल्पना बहन, प्रशंसा के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 13, 2018 at 7:54pm

आ. भाई तस्दीक अहमद जी, आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया से मन आश्वस्त हुआ । कमियों के बारे बताते रहिये । इस स्नेह के लिए आभार ।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on February 13, 2018 at 6:58pm

बढ़िया ग़ज़ल कही है आदरणीय , जिसके लिए बधाई स्वीकारें |

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 13, 2018 at 3:20pm

जनाब लक्ष्मण धामी साहिब ,सुरेन्द्र ग़ज़ल हुई है ।मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 12, 2018 at 5:00pm

आ. भाई आमोद जी, गजल का अनुमोदन और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by amod shrivastav (bindouri) on February 12, 2018 at 10:30am

आ मुसाफिर साहब ...बहुत ही खूब 

सादर बधाई ....नमन 

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