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खुली खिचड़ी(लघु कथा)


मामले की सुनवाई के उपरांत सजा तय हो चुकी थी।अब ऐलान होना शेष था।न्याय-प्रक्रिया के चौंकानेवाले तेवर के मद्दे नजर लोगों में उत्सुकता बढ़ती जा रही थी कि घोटाले के इस मामले में आखिर क्या सजा होती है।बाकी के हश्र सामने थे,वही ढाक के तीन पात जैसे।और न्याय की देवी आज -कल में फँसी हुई थी,क्योंकि कभी किसी वकील की मर्सिया-सभा हो रही होती, तो कभी कुछ और कारण होता।
-फिर कल?
-‎हाँ, अब कल सजा सुनाई जायेगी।
-‎वो क्यों?
-‎पता नहीं।हाँ मुजरिम ने कुछ कम सजा की गुहार लगायी है।
-‎मतलब कि यहाँ भी आरक्षण?
-‎अरे नहीं रे चंदू,बात कुछ और लगती है',भोला बोला।
-‎हाहाहा!पब्लिक सब जानती है।लगता है खिचड़ी तवे पर पक रही है ........च्च... ओर... सब...स्सा..',चंदू नजर नचाते हुए कहता चला गया।
-‎..और महक हवा में तैर रही है,हेहेहे---',भोला ने चुटकी ली।

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Manan Kumar singh on January 10, 2018 at 8:01am

शुक्रिया मुसाफिर जी।

Comment by Manan Kumar singh on January 10, 2018 at 8:01am

बहुत-बहुत आभार आदरणीया राजेश जी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 10, 2018 at 7:01am

बेहतरीन कथा, हार्दिक बधाई।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 9, 2018 at 9:22pm

हर तरफ मिली भगत सांठ गाँठ कोई सा महकमा नहीं बचा इस बीमारी से .न्याय प्रक्रिया पर बढिया कटाक्ष करती हुई लघु कथा .बहुत बहुत बधाई आद० मनन जी 

Comment by Manan Kumar singh on January 8, 2018 at 7:32pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय सुरेन्द्र  जी।

Comment by Manan Kumar singh on January 8, 2018 at 7:31pm

बहुत बहुत आभार आदरणीयआरिफ जी।

Comment by Manan Kumar singh on January 8, 2018 at 7:30pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय समर जी। 'मामला' शब्द तो अब पुराना भी हो चुका है,सादर।

Comment by Manan Kumar singh on January 8, 2018 at 7:28pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय मोहित जी।

Comment by Manan Kumar singh on January 8, 2018 at 7:28pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय उस्मानीजी।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on January 8, 2018 at 1:28pm

आद0 मनन कुमार जी सादर अभिवादन। बेहतरीन लघुकथ समसामयिक बातों के संदर्भ में,बहुत बहुत बधाई आपको।

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