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परित्यागी (कविता)राहिला

ना हम तुम से कोई प्रश्न करें।।
न तुम हम से कोई सवाल करो ,
ना हम तुमसे कोई शिक़वा करें।।
ना तुम हम से कोई मलाल रखो।

तुम मन चाहा पथ चुन ही लो,
फिर मेरी राह ना आन धरो।।
तुम मन चाहा स्वप्न बुन ही लो,
फिर मेरे दर ना कान धरो।

जब अंध अहं सीमा लांघे,
जब मेरा वजूद ख़ाक करो ,
तब स्वयं स्वतंत्र कर मेरा मन
तुम मुझ पर अहसान करो।।

जाओ ,जहाँ तुम्हें छाँव मिले,
जाओ, वहाँ जहां दिल खिले,
जाओ,सत्य स्वीकार किया,
तुम अपना जहाँ आबाद करो

अब ना चाहो, कि संग चलूँ,
और मनमाना सा भरम रखूँ,
या सरि का दूजा तट बनूँ,
तुम अब ना मेरी सांस हरो।

ना हम तुमसे कोई प्रश्न करें,
न तुम हमसे कोई सवाल करो।।

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 21, 2017 at 1:05pm
अच्छी कविता हुई आदरणीया..सादर
Comment by pratibha pande on November 20, 2017 at 11:27pm
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति प्रिय राहिला जी हार्दिक बधाई
Comment by Samar kabeer on November 20, 2017 at 2:40pm
मोहतरमा राहिला जी आदाब,कविता का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Mohammed Arif on November 20, 2017 at 8:00am
आदरणीया राहिला जी आदाब,
मेरे कहने का नाम आशय यह है कि यह सुंदर अभिव्यक्ति तो है ही और रचना नकारने के लायक कतई नहीं है । यदि आप किसी छंद में लिखती तो अच्छा होता । कौन से छंद में रचना बेहतर होगा यह आपको तय करना होगा ।
Comment by Rahila on November 20, 2017 at 6:46am
आदरणीय आरिफ़ साहब सिर्फ अभिव्यक्ति है। मुझे छंद ,मात्रा देखकर ही बुखार आ जाता है। यदि ये कविता के व्याकरण से सही नहीं है तो बेशक़ नकारने योग्य है।
Comment by Mohammed Arif on November 19, 2017 at 11:33pm
आदरणीया राहिला जी आदाब,
सुंदर भावाभिव्यक्ति । दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें । यह रचना किस छंद में लिखी गई है ? बताने का कष्ट करें ।

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