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शंख बजे ज्यों ही ठण्डी के

शंख बजे ज्यों ही ठण्डी के,
मौसम ने यूं पलट खाया,
शीतल हो उठा कण-कण धरती का,
कोहरे ने बिगुल बजाया!!

हीटर बने हैं भाग्य विधाता,
चाय और कॉफी की चुस्की बना जीवनदाता,
सुबह उठ के नहाने वक्त,
बेचैनी से जी घबराता!!

घर से बाहर निकलते ही,
शरीर थरथराने लगता,
लगता सूरज अासमां में आज,
नहीं निकलने का वजह ढूढ़ता!!

कोहरे के दस्तक के आतंक ने,
सुबह होते ही हड़कंप मचाया,
शंख बजे ज्यों ही ठण्डी के
मौसम ने यूं पलटा खाया!!

दुबक पड़े इंसान रजाईयों में,
ठण्ड की मार से,
कांप उठा कण-कण धरती का
मौसम की चाल से!!

बजी नया साल की शहनाईयां,
और क्रिसमस के इंतज़ार में,
झूम उठा पूरा धरती,
अपने-अपने परिवार में!!

शंख बजे ज्यों ही ठण्डी के,
मौसम ने यूं ही पलट खाया,
शीतल हो उठा कण-कण धरती का,
कोहरे ने बिगुल बजाया!!
.
सुशील कुमार वर्मा
दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर
अप्रकाशित और मौलिक

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Comment

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Comment by Mohammed Arif on November 20, 2017 at 8:16am
आदरणीय सुशील कुमार जी आदाब,
बहुत भी बेहतरीन रचना । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । आदरणीय सुरेंद्रनाथ जी की बातों का संज्ञान लें ।
Comment by Samar kabeer on November 19, 2017 at 5:32pm
जनाब सुशील कुमार वर्मा जी आदाब,अच्छा प्रयास है,बधाई स्वीकार करें ।
जनाब सुरेन्द्र जी की बातों का संज्ञान लें ।
Comment by Sushil Kumar Verma on November 19, 2017 at 3:24pm
बहुत बहुत धन्यवाद सुरेन्द्र नाथ जी!!
आपने मेरे कमियों को बताया
Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on November 19, 2017 at 2:30pm
आद0 सुशील कुमार वर्मा जी सादर अभिवादन, अच्छा प्रयास किया है आपने पर कविता में शब्दकल सही शब्द संयोजन और तुकान्तता का विशेष महत्व होता है। एक समान मात्रा भार आप लेते और शब्दकल सटीक होते तो गेयता आ जाती। तुकान्तता पर भी विशेष ध्यान दीजिए, चाल से की तुकान्तता मार से कैसे? बहरहाल इस प्रस्तुति पर बधाई।

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