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दिल धड़कता था जिस अजनबी के लिए

*212 212 212 212*

हो गया ख़ास वह, ज़िंदगी के लिए।
दिल धड़कता था' जिस, अज़नबी के लिए।।

दूर तुम से रहा, आज तक मैं सनम,
हूँ ख़तावार उस, बेबसी के लिए।।

जान देकर तुझे, जान जाता अगर,
जान जीता नहीं, मयकशी के लिए।।

देख चहरा तिरा, चाँद शरमा गया,
बन गई शम'अ तू, तीरगी के लिए।।

मुझको' रब की कई, नेमतें मिल गईं,
सर झुकाया सदा, बंदगी के लिए।।

बिन तिरे एक पल, मुझको' जीना नहीं,
दिलनशीं चाहिए, दिल्लगी के लिए।।


फ़र्ज़ बाकी अगर, एक भी रह गया,
'दीप' काबिल नहीं, खुदकुशी के लिए।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 17, 2017 at 10:42pm
उम्दा ग़ज़ल हुई आदरणीय प्रदीप जी..
Comment by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on November 17, 2017 at 8:51pm
शुक्रिया ज़नाब अफ़रोज़ साहिब!
Comment by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on November 17, 2017 at 8:50pm
ज़नाब समर कबीर साहिब!

शुक्रिया! बिल्कुल सही फ़रमाया।
Comment by Samar kabeer on November 17, 2017 at 8:26pm
मक़्ते के सानी मिसरे में 'क़ाबिल'शब्द मुनासिब नहीं लगता,मेरे ख़याल से मक़्ता यूँ होना चाहिए :-

'फ़र्ज़ बाक़ी रहे जब तलक एक भी
'दीप'मत सोचना,ख़ुदकुशी के लिए'
Comment by Afroz 'sahr' on November 17, 2017 at 8:03pm
जनाब प्रदीप पाण्डेय जी अब मक्ता ठीक है,,सादर
Comment by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on November 17, 2017 at 5:22pm
ज़नाब अफ़रोज़ साहिब!

ग़ज़ल में आपकी शिरकत के लिए शुक्रिया। अगर मक़्ते को कुछ यूँ कहें तो......

फ़र्ज़ बाकी रहे, जब तलक एक भी,
'दीप' काबिल नहीं, ख़ुदकुशी के लिए।।
Comment by Afroz 'sahr' on November 17, 2017 at 12:25pm
आदरणीय प्रदीप कुमार जी इस रचना पर बहुत बधाई आपको।
मक्ते में रब्त नहीं दिख रहा ,,,सादर
Comment by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on November 17, 2017 at 11:39am
आद० बासुदेव अग्रवाल 'नमन' दादा जी!

सादर वंदन! आपकी कृपादृष्टि जिस किसी पर भी रहेगी, वह जहाँ भी रहेगा, सक्रिय रहेगा। बहुत बहुत धन्यवाद आपका। कृपादृष्टि बनाए रखिए।
Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on November 17, 2017 at 11:29am
वाहहहह प्रदीप कुमार पांडे जी बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल। शेर दर शेर दाद हाजिर है। आपको इस मंच पर सक्रिय देख बहुत सुखद अनुभूति हुई।
Comment by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on November 16, 2017 at 5:34pm
ज़नाब समर कबीर साहिब!

ग़ज़ल में आपकी शिरकत के लिए शुक्रिया। इसी कदर नज़र-ए-इनायत करते रहिए।

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