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भोला ने हाँफते-हाँफते घर में प्रवेश किया और माँ से बोला -" जल्दी से दे......जल्दी से दे....देर न कर...बाहर लूट मची है....लूट मची है... मुझे भी लूटकर लाना है.....।"
" मगर क्या दे दूँ..... किस चीज की लूट मची है....मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा बेटा....?"
" दो-चार खाली डिब्बे और कुछ प्लास्टिक की बोतलें दे दे ।'
" लेकिन क्यों ?"
" तू नहीं समझेगी माँ । कल रात अयोध्या में नई सरकार ने लाखों की संख्या में दीए जलाए थे । दीयों में बचा तेल हमारे जैसे कई गरीब के बच्चे लूट के ले जा रहे हैं । मैं भी लाऊँगा ताकि तू चार-पाँच दिन उससे सब्जी बना सके ।"
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 22, 2017 at 9:02pm
आदरणीय आरिफ जी कितनी पैनी सोच के साथ इतने कम शब्दों में आपने गरीबी की दारुण व्यथा को इतने कम शब्दों में व्यक्त कर दिया इस काबिले तारीफ़ रचना पर हार्दिक बधाई सादर
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 22, 2017 at 8:38pm

बढ़िया कथा आदरणीय मोहम्मद आरिफ साहब | हार्दिक बधाई |

Comment by Mohammed Arif on October 22, 2017 at 7:59pm
आपकी उत्साहजनक टिप्पणी से अभिभूत हो गया आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी । दिली आभार आपका ।
Comment by Mohammed Arif on October 22, 2017 at 7:58pm
आदरणीय वासुदेव जी आदाब,आपकी सकारात्मक और उत्साहजनक प्रतिक्रिया से संबल मिला । हार्दिक आभार ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 22, 2017 at 7:38pm
लघुकथा मानकों के बढ़िया परिपालन के साथ विसंगति को सुस्पष्ट उभारती कटाक्ष पूर्ण बेहतरीन लघुकथा के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहब। आपके ऐसे सृजन से हमें कम शब्दों में सारगर्भित सृजन की प्रेरणा व सबक़ मिलते हैं।
Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on October 22, 2017 at 2:30pm
वाहहहह मोहम्मद आरिफ जी करारा व्यंग। बहुत खूब।

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