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ग़ज़ल -- ग़लती कर पछताए कौन // दिनेश कुमार

22__22__22__2
.
ग़लती कर पछताए कौन
ख़ुद से नज़र मिलाए कौन
.
अपनी अना मिटाए कौन
सच्ची अलख जगाए कौन
.
पिछले लेखे-जोखे हैं
अपने कौन पराए कौन
.
राम भी कब से भूखे हैं
झूठे बेर खिलाए कौन
.
कस्तूरी मिल जाएगी
ख़ुद में गहरे जाए कौन
.
तूफ़ां नाम का तूफ़ां है
लहरों से टकराए कौन
.
माज़ी माज़ी करें सभी
मुस्तक़बिल चमकाए कौन
.
( मौलिक व अप्रकाशित )

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Comment

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Comment by दिनेश कुमार on October 10, 2017 at 12:10pm
आत्ममुग्धता जैसी कोई बात नहीं है आ. सौरभ सर। कुछ व्यक्ति अपनी बात सशक्त तरीक़े से सही कहना नहीं जानते, बस मैं उनमें से एक हूँ। आम आदमी हूँ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 10, 2017 at 10:29am

आदरणीय दिनेश जी, आपकी कुछ टिप्पणियाँ पढ़ गया. आप एक विचारवान रचनाधर्मी हैं. उस हिसाब से आपकी टिप्पणियों की कुछ पंक्तियाँ चकित करने वाली हैं. ऐसी निर्लिप्तता उचित है क्या ? वैसे भी यह निर्लिपता नहीं एक तरह की आत्ममुग्धता जैसी कुछ है. ऐसी किसी भावदशा से हम सभी साग्रह बचने का प्रयास करें.. 

शुभकामनाओं के साथ ..

शुभ-शुभ

Comment by दिनेश कुमार on October 10, 2017 at 5:12am
बहुत बहुत शुक्रिया आ. राज साहब। हौसला अफ़ज़ाई करने के लिए।
Comment by दिनेश कुमार on October 10, 2017 at 5:09am

ग़ज़ल पसन्द करने का बहुत बहुत शुक्रिया आ. सौरभ सर।
आपके दोनों ऐतराज़ सही हैं। कौन के बाद प्रश्नवाचक चिन्ह ज़ियादा बेहतर होता। और दूसरा बेर भी liar नहीं होते। एक कॉन्फेशन कि मैंने कभी आज तक जूठे शब्द का प्रयोग नहीं किया। लिखते वक्त। ग़ज़ल में नहीं, वैसे भी। शायद इसीलिए ग़लती अपने आप हो गई। शुक्रिया सर, ध्यान दिलाने के लिए। सादर।

Comment by दिनेश कुमार on October 10, 2017 at 4:58am

बहुत बहुत शुक्रिया आ. आरिफ़ साहब। ज़र्रानवाज़ी है आपकी जो आप मुझे ग़ज़लगो कहते हैं। तुकबंदी ही करता हूँ बस। शुक्रिया सर।
सच कहूं तो मैं मेंटली डिसऑर्डर का शिकार हूँ। अन्य विधाओं की रचना कभी कभी पढ़ता ज़रूर हूँ, लेकिन टिप्पणी करने का मूड नहीं होता।
ऐसा भी बहुत बार हुआ है कि मैंने अपनी ही रचनाओं पर आप सब आ. मित्रों की हौसला अफ़ज़ाई करती हुई प्रतिक्रियाओं का भी जवाब न देने की हिमाकत की है। सादर। आप सब की मुहब्बत को तहे दिल से सलाम। सादर

Comment by दिनेश कुमार on October 10, 2017 at 4:48am
बहुत बहुत शुक्रिया आ. निलेश सर। इनायत।
Comment by राज़ नवादवी on October 9, 2017 at 7:42pm

आदरणीय दिनेश कुमार जी, आपकी ग़ज़ल को पढ़ कर बहुत अच्छा लगा, एक रसभरी गेयता का अनुभव हुआ. बधाई हो. सादर. 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 9, 2017 at 4:25pm

भाई दिनेश कुमार जी, आपकी ग़ज़ल का ढंग आध्यात्मिक है. इन शरों की कथ्यात्मक गहराई आश्वस्तिकारी है. जैसे ,

पिछले लेखे-जोखे हैं
अपने कौन पराए कौन

 

कस्तूरी मिल जाएगी
ख़ुद में गहरे जाए कौन ,......................... वाह ! 

 

लेकिन, साथ ही, प्रश्न्वाचल पंक्तियों के लिए ? का चिह्न अन्योन्याश्रय हुआ करता है. इसे क्यों छोड़ दिया आपने ?

दूसरे, झूठे और जूठे में अंतर तो है न ? फिर बैर के साथ झूठे क्यों ? क्या बैर भी liar होते हैं ? .. :-))

शुभातिशुभ

Comment by Mohammed Arif on October 9, 2017 at 12:09pm
आदरणीय दिनेश कुमार जी आदाब, बहुत ही प्यारी छोटी बह्र की ग़ज़ल । हर शे'र लाजवाब । दली मुबारकबाद क़ुबूल करें ।
नोट:- कितना अच्छा अगर आप जैसे ग़ज़गो साहित्य की अन्य विधाओं में अपनी सृजनशीलता का परिचय देने वालों को भी अपनी टिप्पणियों से पोषित करें ताकि उनका उत्सासवर्धन हो सके ।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 9, 2017 at 9:33am

वाह वा... सभी अशआर बेहद उम्दा और मानिखेज़ हैं..
बधाई 

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