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पूछ रही सवाल धरा है
सुनलो ज़रा उसकी पुकार

मथ रहे हो जो लगातार
कितना और करोगे व्यापार

खनिज मेरा तुम छिनते हो
फिर कहते हो खुद को महान

मेरी चीज़ो से ही जानो
बनते हो तुम धनवान

मनुष्य हो तुम पशु नहीं हो
पशुता फिर भी है बिराजमान

मथ रहे हो जाने कब से
अब मथो कुछ खुद को भी

शायद विष पशुता का निकले
और दिख जाये तुममें इंसान ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 31, 2017 at 6:46pm

आदाब आदरणीय समर भाई जी  | धन्यवाद आपका |

Comment by Samar kabeer on July 31, 2017 at 6:36pm
बहना कल्पना भट्ट जी आदाब,अच्छी लगी आपकी कविता,बधाई स्वीकार करें ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 31, 2017 at 5:21pm

धन्यवाद् आदरणीय खुर्शीद खैरादी जी |

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 31, 2017 at 5:20pm

आदाब जनाब मोहम्मद आरिफ साहब , जी आपने सच कहा है छंदबद्ध् होती तो बेहतर होती , अभी छंद पर मेरा अभ्यास नहीं हुआ है आदरणीय पर प्रयास करुँगी | सादर |

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 31, 2017 at 5:17pm

धन्यवाद् आदरणीय श्याम नारायण जी |

Comment by khursheed khairadi on July 29, 2017 at 9:15am
आदरणीया कल्पना जी , सुन्दर कविता। हार्दिक शुभकामनाएँ। सादर।
Comment by Mohammed Arif on July 28, 2017 at 5:19pm
आदरणीया कल्पना भट्ट जी आदाब, बेहतरीन कविता का प्रयास । अगर इस कविता को छंदबद्ध लिखा जाता तो और बेहतर होता । बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Shyam Narain Verma on July 28, 2017 at 4:18pm
बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति , बधाई आप को | सादर 

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