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सुंदर चितवन उर बसे ,सुंदर सुंदर नैन ।
मृगनैनी को देखकर खोया खोया चैन ।।

अलक छटा बिखरी हुई यौवन पर मधुमास ।
मेघ तृप्त करने चला शुष्क धरा की प्यास ।।

श्वास श्वास में दीर्घता ,अग्नि हुई उच्छ्वास ।
दहकी सारी देह है ,प्रियतम तेरे पास ।।

ज्वाला मुखरित जब हुई,प्रणय बना उन्माद ।
प्रिय के स्वर करते गए,जीवन भर अनुनाद ।।

प्रियतम का है आगमन ,मन में हाहाकार ।
दर्पण पर होने लगी ,प्रश्नों की बौछार ।।

क्षण प्रतिक्षण वह कामिनी,लेती वाट निहार ।
पल दो पल भारी हुए ,व्याकुल सब श्रृंगार ।।

---नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित
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Comment by Naveen Mani Tripathi on June 30, 2017 at 9:59pm
आ0 नरेंद्र सिंह चौहान जी आभार ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on June 30, 2017 at 9:59pm
आ0 श्याम नारायण वर्मा जी आभार ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on June 30, 2017 at 9:58pm
आ0 कबीर सर सादर नमन
Comment by Samar kabeer on June 30, 2017 at 6:58pm
जनाब नबीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,बहुत उम्दा दोहे रचे आपने,मज़ा आ गया पढ़ कर,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।
Comment by narendrasinh chauhan on June 30, 2017 at 8:17am

सुन्दर दोहे आदरणीय 

Comment by Shyam Narain Verma on June 29, 2017 at 11:44am
बहुत सुन्दर दोहे आदरणीय  । हार्दिक बधाई आपको 

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