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ग़ज़ल...क्या क्रांति की है दुन्दभि या सिर्फ ये उफान है

मुफाइलुन मुफाइलुन मुफाइलुन मुफाइलुन
1212 1212 1212 1212
सुदूर उस तरफ जहाँ झुका वो आसमान है
वहीँ उसी दयार में गरीब का मकान है

ये आजकल जो शोर है शहर शहर गली गली
क्या क्रांति की है दुन्दभि या सिर्फ ये उफान है

चढ़ाव ज़िन्दगी का ज्यूँ मचलती है कुई लहर
कदम जरा सँभल के रख बहुत खड़ी ढलान है

जड़ों से जो जुदा हुये जमीन भी न पा सके
​​बिखर गये वो टूटकर समय का ये बयान है

ये प्यार की छुअन हुई या कसमकस ए ज़िन्दगी
बृजेश के ललाट पे जो चोट का निशान है
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 29, 2017 at 9:45pm
आदरणीय आरिफ जी आपका हार्दिक आभार..सादर
Comment by Mohammed Arif on May 28, 2017 at 7:52pm
आदरणीय बृजेश कुमार जी आदाब, बहुत अच्छी ग़ज़ल । दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें । गुणीजन शैल्पिक विधान के बारें बेहतर तरीक़े से बतलाएँगे ।

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