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नूर की हिंदी ग़ज़ल ..दर्पणों से कब हमारा मन लगा

२१२२/२१२२/२१२ 
.
दर्पणों से कब हमारा मन लगा
पत्थरों के मध्य अपनापन लगा. 
.
लिप्त है माया में अपना ही शरीर
ये समझ पाने में इक जीवन लगा.
.
तप्त मरुथल सी ह्रदय की धौंकनी
हाथ जब उस ने रखा चन्दन लगा.
.
मूर्खता पर करते हैं परिहास अब
जो था पीतल वो हमें कुन्दन लगा.
.
प्रेम में भी कसमसाहट सी रही
प्रेम मेरा आपको बन्धन लगा.
.
जल रहे हैं हम यहाँ प्रेमाग्नि में
और उस पर ये मुआ सावन लगा.
.
मंदिरों की सीढ़ियों पर भूख थी 
चन्द्र भिक्षापात्र सा बर्तन लगा.
.
माँ को अम्मी कह रहा था मित्र, बस!
उसका आँगन अपना ही आँगन लगा.         
.
निलेश "नूर"
.
मौलिक/ अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 16, 2017 at 8:54am

शुक्रिया आ. महेंद्र जी 

Comment by Mahendra Kumar on May 15, 2017 at 12:36pm

आदरणीय निलेश जी, हमेशा की तरह एक और बढ़िया ग़ज़ल पढने को मिली आपसे. हार्दिक बधाई प्रेषित है. सादर.

Comment by Samar kabeer on May 13, 2017 at 10:35am
जनाब योगराज प्रभाकर साहिब आदाब,बहुत सही क़दम है ये,इससे दूसरे ऐसे लोग भी सबक़ ज़रूर लेंगे ।ओबीओ ज़िंदाबाद ।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 13, 2017 at 9:47am

धन्यवाद आ. योगराज सर,



प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 13, 2017 at 9:33am

राघव प्रियदर्शी जी शायद इस मंच पर कोई निजी अजेंडा लेकर आए हैं जिसका एकमात्र उद्देश्य मँच के एक अति सम्माननीय सदस्य को निशाना बनाकर उनका अपमान करना हैI ऐसा व्यवहार न पहले बर्दाश्त किया गया है न ही भविष्य में किया जाएगाI अत: राघव प्रियदर्शी जी की सदस्यता तुरंत प्रभाव से समाप्त की जा रही हैI   

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 13, 2017 at 8:35am

आ. शिज्जू भाई,
आप मंच  पर चल रहे एक कुत्सित खेल से व्यथित होकर टिप्पणी करने आये जिसके लिये आप का हार्दिक धन्यवाद..
राघव जी को मैंने भी एक जवाब दिया था लेकिन फिर डिलीट  कर दिया क्यूँ कि मुझे जॉर्ज बर्नाड शॉ का एक quote याद   आ गया जो बचपन में  पढ़ा था और अबतक अमल में लाता हूँ...
quote    कुछ यूँ था ..
"I learned long ago, never to wrestle with a pig. You get dirty, and besides, the pig likes it."
अत: मैंने इन सज्जन को इनकी सज्जनता के साथ यूँ  ही कुढने देने का तय किया है ...
सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 13, 2017 at 6:52am
जनाब राघव जी मुआफ़ी चाहता हूँ बीच में कूदने के लिए, अपने विचार या अपनी विचारधारा आप दूसरों पर थोपने की कोशिश करें और प्रतिरोध न हो ये नहीं हो सकता, अनुराग जी ने इस ग़ज़ल पर जो नुक्ताचीनी की है वो फ़क़त कोरी मलामत है जिसका रचनाकर्म या भाषा से संबंध नहीं है। इस ग़ज़ल में भाषा का कोई ऐसा प्रयोग नहीं हुआ है कि इस पर तल्ख टिप्पणी की जाए। किसी पर बेसबब बदला निकालने के लिए पत्थर मारेंगे तो आपको भी वही जवाब मिल सकता है। ग़ज़ल में अरूज से संबंधित गलतियाँ हो तो इंगित करें। फिर से माजरत चाहूँगा सिर्फ गलतियाँ निकालनी है तो निकालते रहें निकालने वाले वो कोई महान भाषाविद नहीं हैं जिनकी बात को गंभीरता से लिया जाए।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 11, 2017 at 12:21pm

आ. अनुराग जी 
.

""अब आप अपनीवाली पे उतर आये हैं."" 
नहीं हुज़ूर,,, मेरी वाली तो मेरी ग़ज़ल में है .. ये तो आप की वाली है ...जिसे आप सुनना पसंद करते हैं..
सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 11, 2017 at 12:18pm

आ. योगराज सर,

मेरी भाषा और भावों को कृत्रिम कहा गया है,,, यदि माक़ूल जवाब न दूँ तो ये आरोप स्वीकार करने के जैसा घोर पाप होगा,,,
टिप्पणीकारों को चाहिए कि जो भाषा अथवा भाव वो समझ पाने में असमर्थ हैं, उस के प्रति पूर्वाग्रह   से ग्रस्त हो कर टिप्पणी न किया करें ...
बाक़ी आप कहें तो रचना डिलीट कर देता हूँ मैं.....वो भी बिना किसी अफ़सोस के ..
सादर 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 11, 2017 at 12:13pm

आ० भाई निलेश नूर जी व अनुराग वशिष्ठ जीI क्या आपको नहीं लगता कि अब इस बहस को विराम दे देना चाहिए? 

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