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ग़ज़ल नूर की -बस किसी अवतार के आने का रस्ता देखना

२१२२/२१२२/२१२२/२१२ 

बस किसी अवतार के आने का रस्ता देखना
बस्तियाँ जलती रहेंगी, तुम तमाशा देखना.
.
छाँव तो फिर छाँव है लेकिन किसी बरगद तले
धूप खो कर जल न जाये कोई पौधा, देखना.
.
देखने से गो नहीं मक़्सूद जिस बेचैनी का
हर कोई कहता है फिर भी उस को “रस्ता देखना”  
.
क़ामयाबी दे अगर तो ये भी मुझ को दे शुऊ’र 
किस तरह दिल-आइने में अक्स ख़ुद का देखना.
.
चाँद में महबूब की सूरत नज़र आती नहीं   
जब से आधे चाँद में आया है कासा देखना.
.
तीरगी फिर कर रही है घेरने की कोशिशें,
“नूर” है तेरा इसे तू ही ख़ुदाया देखना.
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 1678

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Comment by Manan Kumar singh on May 7, 2017 at 10:01pm
आदरणीय नीलेश जी,जानना मेरे लिए शेष नहीं रहा अब।रही बात आपकी तो वह आपकी बात है,और आप पर है।समाप्तप्राय चर्चा को तूल देना भी शायद वक्त का तकाजा नहीं है।रही बात जज कहने की,तो जज शब्द के उच्चारण भर से न कोई जज होता है ,न आरोपी।यह सब परिस्थिति और साक्ष्य तय करते हैं कि ऐब कहाँ है।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 7, 2017 at 8:49pm

शुक्रिया आ. सतविन्द्र जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 7, 2017 at 8:49pm

आ. सुरेन्द्रनाथ जी,

आभार 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 7, 2017 at 8:49pm

आ. मनन जी,

अपने पूर्व कमेंट को  पढ़िये..... जज कि बात कौन कर रहा है ..जान जाइएगा 
सादर 

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on May 7, 2017 at 3:04pm
आदरणीय नीलेश जी,हार्दिक बधाई इस ग़ज़ल और इस पर हुई चर्चा के लिए।
Comment by नाथ सोनांचली on May 6, 2017 at 8:53pm
आदरणीय भाई नीलेश जी सादर अभिवादन, बहुत उम्दा गजल कहीं आपने, और इस गजल पर चली सार्थक चर्चा से हम जैसे नवंतुको को भी फायदा होंगा।
चाँद में महबूब की सूरत नज़र आती नहीं
जब से आधे चाँद में आया है कासा देखना.
इस शैर के लिए अलग से अतिरिक्त बधाई।
Comment by Manan Kumar singh on May 6, 2017 at 8:52pm
आदरणीय,बजा फरमाया आपने।अदावत जैसी तो कोई बात ही नहीं है यहाँ।हाँ,आरोपी कौन और जज कौन यह अब तो अस्पष्ट नहीं है,सादर।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 6, 2017 at 8:38pm

आ. मनन जी,
ग़ज़ल कहता हूँ तो इशारों में बात  कहता हूँ.... इशारे समझता भी ख़ूब हूँ ....
जज की सोच पर अगर एक ऊँगली उठी है तो आरोपी पर  तीन उठी हैं ..
वैसे अदब में अदालत आनी ही नहीं चाहिए लेकिन ....बहुत से मुहावरे हैं इस मौजूं पर ...
जाने दीजिये 
.

सादर 

Comment by Manan Kumar singh on May 6, 2017 at 8:28pm
आदरणीय, भावार्थ पर जाते तो शायद शंकाकुल नहीं होते।वर्त्तमान संदर्भ की बात थी,उदहारण जुटाने से संबंधित।खैर खैरख्वाही भी कोई चीज होती हैं,सो आपने दिखा दी।जज भी बात सुन-समझकर फैसले लिये करते हैं,आदरणीय।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 6, 2017 at 8:10pm

आ. मंच..
आम तौर पर मैं टिप्पणियाँ डिलीट  नहीं करता लेकिन आ. मनन जी की टिप्पणी मंच   की गरिमा में अनुरूप नहीं थी इसलिए मैंने यहाँ से हटा दी है ..
उम्मीद है कि वो भविष्य में कम  से  कम अदबी मंच की  गरिमा का ख़याल रखेंगे ...
सादर 

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