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ग़ज़ल नूर की -कहीं सजदा किया, पूजा कहीं पत्थर तेरा,

२१२२/११२२/११२२/२२
.
कहीं सजदा किया, पूजा कहीं पत्थर तेरा,
अपने अंदर ही मगर मुझ को मिला घर तेरा. 
.
मेरी आँखों में उतरना तो उतरना बचकर,
ख़ुद में तूफ़ान छुपाए है..... समंदर तेरा.  
.
यूँ ही पीछे नहीं चलता है ज़माना तेरे,
नापता रहता है क़द ये भी बराबर तेरा.
.
दिल को आदत सी पड़ी है कि ख़ुदा ख़ैर करे,
ढूँढ लाता है कहीं से भी ये नश्तर तेरा.

तर्क  अब इस से ज़ियादा मैं करूँ क्या ख़ुद को
ये अना तेरे हवाले ये मेरा सर ....तेरा.

हिचकियाँ ‘नूर’ तेरी बंद भला हों कैसे
नाम इक शख्स लिया करता है अक्सर तेरा. 
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 113

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on Monday

शुक्रिया आ. अनुराग जी ...
जिसे आप सूफ़ी प्रभाव कह रहे हैं वो अस्ल में मानने और नहीं मानने के  मैदान में नदी-पहाड़ खेलने जैसा है ...
दाम  बचाने के लिये पहाड़ पर.... बाक़ी.. तेरी नदी में रोटी पकाऊं 

Comment by Anuraag Vashishth on Monday

आ. निलेश जी,

सूफी प्रभाव आप की लगभग हर ग़ज़ल की तरह इसमें भी खूबसूरती से अनुस्युत है.बधाई हो.

सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on Monday

शुक्रिया आ. बृजेश जी 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Sunday
इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय
Comment by Nilesh Shevgaonkar on Friday

शुक्रिया आ. शिज्जू भाई 

आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on Friday

बेहतरीन ग़ज़ल हुई है आ. निलेश भाई बहुत बहुत बधाई इस ग़ज़ल के लिए,

यूँ ही पीछे नहीं चलता है ज़माना तेरे,
नापता रहता है क़द ये भी बराबर तेरा// वाह क्या खूब कहा

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 20, 2017 at 8:09pm

शुक्रिया आ. सतविन्द्र भाई 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 20, 2017 at 8:08pm

शुक्रिया आ. समर सर 

Comment by सतविन्द्र कुमार on April 20, 2017 at 4:18pm
आदरणीय निलेश जी सारे अशआर कमाल कहे हैं। दिली मुबारकबाद कुबुल फरमाएँ!
Comment by Samar kabeer on April 20, 2017 at 3:18pm
जनाब निलेश'नूर'साहिब आदाब,ये ग़ज़ल भी उम्दा हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

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