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नख़्ल-ए-दिल रेगज़ार करना था-ग़ज़ल नूर की

नख़्ल-ए-दिल रेगज़ार करना था,
इक तसव्वुर ग़ुबार करना था.
.
तेरी मर्ज़ी!!! ये ज़ह’न दिल से कहे,
बस तुझे होशियार करना था.
.
वो क़यामत के बाद आये थे
हम को और इंतिज़ार करना था.
.
हाल-ए-दिल ख़ाक छुपता चेहरे से
जिस को सब इश्तेहार करना था.
.   
लुत्फ़ दिल को मिला न ख़ंजर को
कम से कम आर-पार करना था.
.
चंद यादें जो दफ़’न करनी थीं
अपने दिल को मज़ार करना था.
.
बारहा दुश्मनी!! अरे नादाँ .....
इश्क़ भी बार बार करना था.
.
शर्त यूँ थी सो हार आये हम,
पीठ पर उस की वार करना था.
.
“नूर” सच बोल कर है क्यूँ ज़िंदा,
उस को तो संगसार करना था.  
.
निलेश "नूर"
मौलिक / अप्रकाशित 

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on Monday

शुक्रिया आ अनुराग जी 

Comment by Anuraag Vashishth on Monday

आ. निलेश जी,

हर रंग के शेरों से सजी एक खुबसूरत ग़जल है. बधाई हो.

सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on Sunday

शुक्रिया आ. गिरिराज जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on Sunday

आदरणीय नीलेश भाई , लाजवाब गज़ल कही है आपने .. शे र दर शेर बधाइयाँ स्वीकार की लिये ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on Friday

शुक्रिया आ. शिज्जू भाई 
आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on Friday

तेरी मर्ज़ी!!! ये ज़ह’न दिल से कहे,
बस तुझे होशियार करना था.
.
वो क़यामत के बाद आये थे 
हम को और इंतिज़ार करना था.//

वाह आ. निलेश भाई क्या खूब कहा आपने लाजवाब!

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 20, 2017 at 3:18pm

शुक्रिया आ. रवि जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 20, 2017 at 3:18pm

शुक्रिया आ. समर सर 

Comment by Ravi Shukla on April 20, 2017 at 1:24pm

आदरणीय नीलेश जी बहुत बढि़या और लय बद्ध गजल कही आपने दिली मुबारक बाद हाजिर है ।

Comment by Samar kabeer on April 19, 2017 at 5:42pm
जनाब निलेश'नूर'साहिब आदाब,बहुत उम्दा और मुरस्सा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

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