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1-
पीने में आनंद है, मिथ्या है संसार।
पीने से बढ़ता सदा, आपस में है प्यार।।
आपस में है प्यार,भेद सारे मिट जाते।
टकराते जब जाम,स्वर्ग का सुख तब पाते।।
मदिरा के बिन यार,मजा क्या है जीने में।
जीवन है दिन चार, हर्ज फिर क्या पीने में।।
2-
किसने पाई आजतक, मद्यपान से शांति।
पीने वाला पालता, मन में फिर क्यों भ्रांति।।
मन में फिर क्यों भ्रांति'शांति देगी ये हाला।
खोकर अपना होश,बने फिर क्यों मतवाला।।
हुआ नशे से मुक्त, विचारा मन में जिसने।
करके मदिरा पान, शांति पाई है किसने।।

3.

रोजाना की ही तरह, लेकर पहुँचा चाय।
उनके तेवर सख्त थे, बोलीं वो भन्नाय।।
बोलीं कुछ भन्नाय, देर क्यों इतनी लागी।
मैं तो पूरे तीस, मिनट पहले की जागी।।
बर्तन भी हैं ढेर, बनाओगे कब खाना।
बोलीं आँख तरेर, देर करते रोजाना।।

.
(मौलिक व अप्रकाशित)
**हरिओम श्रीवास्तव**

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Comment

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Comment by Hariom Shrivastava on April 20, 2017 at 7:56pm
आदरणीय नीलेश जी,
आपकी उपस्थिति से रचना को मान मिला। बोलीं कुछ भन्नाय में 'कुछ' की जगह 'वो' करने का आपका सुझाव स्वागत योग्य है। धन्यवाद। पहले छंद में आपने कहा कि स्पष्ट नहीं कि "क्या पीने में"। इस संबंध में छंद में आगे 'जाम टकराने' व 'मदिरा पीने में' का जिक्र आया है। अतः स्पष्ट है कि पीने का अर्थ "मदिरा पीने से है"। सादर। इसी तरह मार्गदर्शन देते रहें। सादर।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 20, 2017 at 4:59pm

आ, हरिओम जी .... 
अच्छे छन्द हुए हैं ..   बधाई ..
.
बोलीं कुछ भन्नाय, देर क्यों इतनी लागी।...... जब आप को पता है कि क्या बोली तो कुछ का प्रयोग ठीक नहीं है .... कुछ अस्पष्टता के लिये ठीक है ....बोली वो भन्नाय ..
.
पहले छन्द में भी ..

पीने में आनंद है, मिथ्या है संसार।
पीने से बढ़ता सदा, आपस में है प्यार।।..... क्या पीने में ?? मदिरा में आनंद है ..... मदिरा से बढ़ता सदा ,,,,,
मैं इस विषय  का ज्ञाता    नहीं हूँ ,,,, भाषा के हिसाब से कुछ लगा   तो कह दिया ..
.

Comment by Hariom Shrivastava on April 20, 2017 at 3:41pm
आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह जी,आपकी सराहनीय प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ। हार्दिक आभार।
Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on April 20, 2017 at 8:48am
आदरणीय हरिओम श्रीवास्तव जी सादर अभिवादन, आपकी बेहद उम्दा भावपूर्ण कुंडलियाँ के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें
Comment by Hariom Shrivastava on April 19, 2017 at 11:45pm
आदरणीय समर समर कबीर जी, आदरणीय अशोक रक्ताले जी,व आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी, मेरी प्रथम प्रस्तुति पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया से अभिभूत हूँ। हार्दिक आभार।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 19, 2017 at 11:35pm

कुण्डलिया छंद में संयत सुगढ़  रचनाएँ हुई हैं .. सादर धन्यवाद आदरणीय 

Comment by Ashok Kumar Raktale on April 19, 2017 at 8:45pm

आदरणीय हरिओम श्रीवास्तव जी सादर, मदिरापान से लेकर चाय तक तीनों ही कुण्डलिया छंद अच्छे रचे हैं. बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें. सादर.

Comment by Samar kabeer on April 19, 2017 at 7:58pm
जनाब हरिओम श्रीवास्तव जी आदाब,बहुत बढ़िया कुण्डलिया छन्द लिखे आपने। इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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