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मेरे प्यारे-प्यारे वैज्ञानिकों

सीलन भरी छत पर बैठकर
चाँद की ख़ूबसूरती को निहारने वाले
मेरे प्यारे-प्यारे वैज्ञानिकों
यदि संभव हो
तो अगली बार
भूख़, ग़रीबी, शोषण
और अत्याचार के साथ
इस नफ़रत भरी
विषैली बेल को भी
अपने उपग्रहों में लपेट कर
इस पृथ्वी से दूर
बहुत दूर
सुदूर अन्तरिक्ष में
छोड़ देना तुम
जहाँ से फिर कभी लौटना
संभव न हो
और हाँ
अगर तुम्हारे यान में
थोड़ी सी जगह और बचे
तो बिठा लेना मुझे भी
और फेंक देना रास्ते में
जहाँ कहीं भी तुम्हारा दिल करे!

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 19, 2017 at 8:59pm
आदरणीय महेंद्र जी इस रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर
Comment by Mohammed Arif on February 19, 2017 at 4:35pm
आदरणीय महेंद्र कुमार जी आदाब, बेहतरीन सोच का प्रदर्शन । बधाई स्वीकार कीजिए ।
Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on February 19, 2017 at 2:55pm
आद0 महेंद्र कुमार जी सादर अभिवादन। कितनी बढ़िया सोच के साथ आपने इस अतुकांत को लिखा है, इसके लिए आपको बधाई , बहुत ही उम्दा, काश ऐसा वैज्ञानिक कर पाते।

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