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मेरी उबड़ -खाबड़ गज़लें भाग -4

(एक मजदूर की सोच )

ना मैं कविता जानता हु ,ना ही ग़ज़ल जानता हु

जिस झोपड़ी में रहता हु उसे महल मानता हु ॥

ना मैं राम जानता हू ,ना मैं रहीम जानता हू

माँ -बाप ने जो फरमाया ,फरमान मानता हू ॥

जिस इंसान ने इंसान को सताया , उसे हैवान मानता हू

जो इंसान की कद्र करे , मैं उसे कद्रदान मानता हू ॥

आशाओ के खंडहर में ,कब तक रहोगे दिल थामके

चल कुदाल उठा ,मैं मेहनत को अपना ईमान मानता हू ॥

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Comment

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 6, 2010 at 8:27pm
Badhiya Prayas hai Babban Bhaiya, Sampadak jee key bato mey dam hai kripaya sudhar karna chaheyngey, Jai hooooooo
Comment by satish mapatpuri on June 28, 2010 at 1:24pm
आशाओ के खंडहर में ,कब तक रहोगे दिल थामके

चल कुदाल उठा ,मैं मेहनत को अपना ईमान मानता हू ॥
जीवन-दर्शन का अच्छा चित्र प्रस्तुत किया है बब्बन जी, बधाई.

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 28, 2010 at 12:29pm
बबन भाई रचना में विचार अच्छे पेश किए हैं आपने ! लेकिन इसको गजल न कहा जाए क्योंकि यह रचना गजल विधान की परिधि में नही आती ! इसको तुकांत वाली कविता कहना ज्यादा उचित रहेगा ! "हूँ" शब्द को आपने सब जगह "हु" या "हू" लिखा है, कृपया उसको भी दुरुस्त कर लें !

कृपया ध्यान दे...

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