For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

 

आकाश से

गिरती है बिजली

और एक हरा भरा पेड़

अचानक बदल जाता है

एक काले ठूंठ में

भीतर तक

 

किसी काम नहीं आती

वह जली लकड़ी

सिवाय सुलगने के

धुवां छोड़ने के 

अपने अंतिम सांस तक

और रह जाता है एक

अलिखित शिलालेख

ध्वंस का इतिहास समेटे

मौन स्तब्ध उदास जड़

निर्जीव

 

हमारे पूर्वज

लीपते थे गोबर से

माटी के घर

और उसकी दीवारें

क्योंकि वह मानते थे

नहीं गिरेगी

कभी आकाश से बिजली

उनके लिपे-पुते घरों में

 

दादी कहती थी

कि यूँ तो

बिजली नही गिरती कभी

गोबर के छोत पर

और यदि गिरती है कदाचित

तो गोबर

बन जाता है सोना

इस मान्यता पर  

अब मन हंसता है

 

छोटा था मैं 

जब गाँव के मंदिर में 

गिरी थी बिजली आर्द्र आकाश से

और मंदिर के बुर्ज में 

खिंच गयी थी भीषण दरार   

टेढा हो गया था वह

भव्य उसका गुम्बज 

जो आज भी खडा है

वैसा ही भग्न

टेढा,  अपराजित

 

कैसे कहूं 

एक बिजली

मुझ पर भी गिरी है 

मेरे क्षुब्ध मन के

सुकुमार मंदिर में 

किसी पथरीले

हृदयहीन आकाश से

भग्न हो गया है मेरा अस्तित्व

खिंच गयी हैं अनगिन

दरारें वपुष में 

जिसे देखता है सारा संसार  

मैं सोचता हूँ 

अब मैं सुलगकर छोडूंगा धुआं

उस वृक्ष की भांति 

जो ठूंठ हो गया था

अंतिम सांस लेने से पहले

और बन जाऊँगा 

मैं भी ध्वंस का

अलिखित शिलालेख 

या फिर रहेगा मेरा अस्तित्व 

टेढा अपराजित

उस भग्न मंदिर की भाँति 

जो खडा है अविचल

आज भी गाँव में

 

 (मौलिक एवं अप्रकाशित )

Views: 457

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by somesh kumar on December 14, 2016 at 9:35am

एक सामान्य मान्यता को अपने व्यकित-सन्दर्भ में देखने का उसे अभिव्यक्त करने का सफल-प्रयास |

Comment by Mahendra Kumar on December 14, 2016 at 9:29am
बहुत ही संवेदनशील कविता है आपकी आदरणीय डॉ. गोपाल सर। इस उत्तम प्रस्तुति पर मेरी तरफ से ढेरों बधाई।
//टेढा हो गया था वह
भव्य उसका गुम्बज// इन पंक्तियों में 'वह' और 'उसका' का प्रयोग एक बार देख लीजिएगा। सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 14, 2016 at 12:57am

आदरणीय डॉ गोपाल सर, बहुत बढ़िया चित्र खींचा है आपने. आँखों के आगे से तैरता हुआ गाँव का मंदिर रचनाकार की मनःस्थिति को शाब्दिक करने में सफल हुआ है. पारंपरिक रूपक को बड़ी ही संवेदनशीलता से और प्रभावकारी ढंग से कविता में बरता गया है. इस प्रस्तुति पर बहुत बहुत बधाई.

Comment by Samar kabeer on December 13, 2016 at 8:47pm
जनाब डॉ.गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी आदाब,बहुत बढ़िया लगी आपकी कविता जैसे कोई कहानी सुना रहा हो,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
7 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Thursday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
Wednesday
Sushil Sarna posted blog posts
Tuesday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service