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ग़ज़ल- जितने सनम मिले सभी शादी शुदा मिले

221 2121 1221 212

ये सिलसिले भी इश्क के हमसे खफा मिले ।
अक्सर मेरे रकीब जमानत रिहा मिले ।।

किस्मत की बेवफाई जरा देखिये हुजूर ।
जितने सनम मिले सभी शादी शुदा मिले ।।

जब भी उठे नकाब हिदायत के नाम पर ।
क्यों लोग आईने में हक़ीक़त ज़ुदा मिले ।।

चर्चा , लिहाज़ उम्र का , उसको नही रहा ।
कुछ तितलियों के फेर में अक्सर फ़िदा मिले।।

अक्सर हबस के नाम पे मरता है आदमी ।
मासूम सी अदा में ढ़ले बेवफा मिले ।।

कहना पड़ा है आज उसे बार बार यह ।
वाजिब कहाँ है बात मुझे ही सजा मिले ।।

इतना तो मानता था हमारी भी बात को ।
कुछ तो जरूर था जो कई मर्तबा मिले ।।

बिकता यहां ज़मीर ये हिन्दोस्तान है ।
बिकने लगे हैं लोग कहीं कुछ नफ़ा मिले ।।

बाजार में सजे हैं नए जिस्म आजकल।
उसको खबर नही है तिजारत में क्या मिले ।।

बदला किया वो यार फ़क़त इन्तजार में ।
शायद किसी नसीब में कुछ तो लिखा मिले ।।

----नवीन मणि त्रिपाठी

मौलिक अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 23, 2016 at 7:06pm

आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी, ग़ज़ल अच्छी कही है आपने, दाद-ओ-मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं.

Comment by Naveen Mani Tripathi on November 23, 2016 at 5:13pm
आ0 सुरेन्द्र सिंह कुश क्षत्रप जी सादर आभार ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on November 23, 2016 at 5:12pm
आदरणीय कबीर सर तहेदिल से शुक्रिया ।
Comment by Samar kabeer on November 23, 2016 at 3:51pm
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल अच्छी हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
कुछ अशआर में अल्फ़ाज़ की नशिस्त चुस्त नहीं है,इसकी तरफ़ तवज्जो फरमाएं,पांचवे शैर में 'हबस को"हवस" कर लें ।
Comment by नाथ सोनांचली on November 23, 2016 at 2:41pm
चर्चा , लिहाज़ उम्र का , उसको नही रहा ।
कुछ तितलियों के फेर में अक्सर फ़िदा मिले।।

आदरणीय जनाब नवीन मनी त्रिपाठी जी बेहद उम्दा अशआर के साथ बेहतरीन गजल। बधाई स्वीकार करें।

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