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दर्द अपना कह रही बस प्रीत गजलों की मेरे।

2122-2122-2122-212

मत करो तारीफ फ़र्जी गीत गजलों की मेरी।।
दर्द अपना कह रही बस प्रीत गजलों की मेरी।।

कशमकश है आप की मेरे दिले दरबार में।
लिख रहा हूँ आज जो भी जीत गजलों की मेरी ।।

राह में निकला मुसाफिर मुफलिसी हूँ ख्वाब हूँ।
चल रही गुपचुप सी बाता चीत गजलों की मेरी।।

मानता हूँ दर्द से लिपटी रही है उम्र भर।
दौरे पर्दा उठ गया है मीत गजलों की मेरी।।

वाह वाही लूटते दिख जायेगे बेशक हमीं।
बज्म बेशक जानती है रीत गजलों की मेरी।।
मौलिक/अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 8, 2016 at 3:34pm

//गजल में बहर और शब्दों को सुना था माफ़ भी कर दिया जाता है जो भाव स्पस्ट हो रहे हों//.

भाई ये क्या सुन लिया आपने और कहाँ सुन??? बह्र के बिना कभी ग़ज़ल नहीं होती है और अपनी सुविधा के लिए शब्दों का स्वरूप बदलना भी सही नहीं होता, मेहनत करते रहिए शिल्प भी सध जाएगा

Comment by amod shrivastav (bindouri) on September 8, 2016 at 11:33am
आ शिज्जू साहब आदाब
सर गजल में बहर और शब्दों को सुना था माफ़ भी कर दिया जाता है जो भाव स्पस्ट हो रहे हों ....वैसे अभी 8 महीने ही हुए है । प्रयास रत हूँ । आप बताते रहे खामिया जरुर ख़त्म करूँगा ..सादर नमन

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 8, 2016 at 11:15am

कशमकश है आप की मेरे दिले दरबार में।
लिख रहा हूँ आज जो भी जीत गजलों की मेरी ।। कहन के हवाले से ये शेर थोड़ा समय चाहता है

राह में निकला मुसाफिर मुफलिसी हूँ ख्वाब हूँ।
चल रही गुपचुप सी बाता चीत गजलों की मेरी।।  बाता चीत???

बहरहाल प्रयास के लिए बधाई आपको

Comment by amod shrivastav (bindouri) on September 7, 2016 at 10:40pm
कल्पना जी सादर आभार नमन
Comment by amod shrivastav (bindouri) on September 7, 2016 at 10:36pm
आदाब समर साहब जी शुक्रिया गजल की कोशिस सराहने के लिए ....सर इत्ती समझ होती तो कर न लेते हम । मुझे लगा गजलो है तो मेरे उचित है । सर हम इसे एडिट किए दे रहरे हैं आप को दिल से नमन सर आगे भी मेरी खामियां बताईए गा जिससे हम समाज में अच्छी रचनाये दोष मुक्त रचनाए ला सके । सदर नमन
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 7, 2016 at 10:32pm

हार्दिक बधाई इस ग़ज़ल के लिए |

Comment by Samar kabeer on September 7, 2016 at 10:23pm
जनाब आमोद श्रीवास्तव जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
ग़ज़ल शब्द चूँकि स्त्रीलिंग है, इस लिहाज़ से आपकी रदीफ़ "की मेरे"ग़लत हो जाती है,'मेरी' को "मिरी"होना

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