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ग़ज़ल.....अब आजमा लें दर्द को

इस्लाह के लिए विशेषकर काफ़िए को लेकर मन में शंकायें हैं 

2122       2122       2122       212

​क्यों नहीं अपनी रगों से हम निकालें दर्द को

है ग़मों की इन्तहां अब आजमा लें दर्द को

बात पहले प्यार से फिर भी नहीं जो मानता 
गेंद की तरहा हवा में फिर उछालें दर्द को

गर ग़मों की चाहतें हैं ज़िन्दगी भर साथ की 
हमसफ़र अपना बना उर में छुपा लें दर्द को

नफरतों के राज में क्या रीत उल्टी चल पड़ी 
दर्द खुद पे रो रहा चल आ संभालें दर्द को

गर खुदा मसरूफ है सुनता नहीं जो ये सदा 
अश्क की स्याही से पन्नों पे सजा लें दर्द को 

वक़्त के हैं हम सिकंदर अपना ये अंदाज़ है 
नींद 'ब्रज' आये तो धरती पे बिछा लें दर्द को 

(​मौलिक एवं अप्रकाशित) 

©बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 12, 2016 at 5:21pm

आपके आशीर्वाद से रचना सफल हुई आदरणीया rajesh kumari जी नमन करता हूँ 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 5, 2016 at 9:58am

अच्छी ग़ज़ल कही है ब्रिजेश जी काफिया एकदम दुरस्त है बहुत बहुत मुबारक हो 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 2, 2016 at 8:33pm
भावों को सम्बल प्रदान करने के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीया KALPANA BHATT जी स्नेह बनाए रखें
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 2, 2016 at 8:31pm
मनोहारी शब्दों में उत्साहवर्धन के लिए आपको कोटि कोटि नमन आदरणीया kanta roy जी
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 2, 2016 at 8:30pm
रचना पटल पे आपका स्वागत है आदरणीय डॉ पवन मिश्र जी
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 2, 2016 at 8:28pm
आदरणीय गुरुदेव गिरिराज भंडारी जी आपके प्यार और स्नेह के लिए ह्रदयतल से आभार
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 2, 2016 at 8:26pm
आदरणीय Samar kabeer जी आपकी विस्तृत समीक्षा एवं मार्गदर्शन के लिए ह्रदयतल से आभार स्नेह बनाए रखें
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on June 2, 2016 at 3:55pm

गर ग़मों की चाहतें हैं ज़िन्दगी भर साथ की 
हमसफ़र अपना बना उर में छुपा लें दर्द को

बहुत खूब |

Comment by kanta roy on June 1, 2016 at 9:50pm
नफरतों के राज में क्या रीत उल्टी चल पड़ी
दर्द खुद पे रो रहा चल आ संभालें दर्द को---- लाजवाब शेर कही है आपने आदरणीय ब्रजेश जी । बहुत गम्भीर मिजाज़ की गजल है यह । बधाई प्रेषित है ।
Comment by डॉ पवन मिश्र on May 29, 2016 at 11:37pm
आदरणीय बृजेश ब्रज जी बहुत खूबसूरत ग़ज़ल।

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