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जब जब तुम्हारे पाँव ने रस्ता बदल दिया (ग़ज़ल)

बह्र : २२१२ १२११ २२१२ १२

 

जब जब तुम्हारे पाँव ने रस्ता बदल दिया

हमने तो दिल के शहर का नक्शा बदल दिया

 

इसकी रगों में बह रही नफ़रत ही बूँद बूँद

देखो किसी ने धर्म का बच्चा बदल दिया

 

अंतर गरीब अमीर का बढ़ने लगा है क्यूँ

किसने समाजवाद का ढाँचा बदल दिया

 

ठंडी लगे है धूप जलाती है चाँदनी

देखो हमारे प्यार ने क्या क्या बदल दिया

 

छींटे लहू के बस उन्हें इतना बदल सके

साहब ने जा के ओट में कपड़ा बदल दिया

---------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 858

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 1, 2016 at 6:51pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय आशुतोष मिश्र जी। बह्र लिखने में मुझसे एक त्रुटि हो गई है ये बह्र २२१२ १२११ २२१२ १२ न होकर २२१ २१२१ १२२ १२१२ है। यानी स्पेस थोड़ा इधर उधर हो गया था। नीचे विस्तृत जानकारी दी गई है।

बह्रे मुजारे मुसम्मन् अखरब मक्फूफ महजूफ

22121211221212

मफ्ऊलु

फायलातु

मफाईलु

फायलुन्

221

2121

1221

212

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 1, 2016 at 6:44pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय समर कबीर साहब।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 1, 2016 at 6:44pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सुशील जी।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 1, 2016 at 6:43pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय  नादिर ख़ान साहब।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 1, 2016 at 6:43pm

शुक्रिया आदरणीय महर्षि जी। किसी भी बह्र के अंत में आने वाले गाम यानी गुरु के बाद एक लाफ यानि लघु लेने की छूट होती है। ज़्यादा जानकारी के लिए वीनस केसरी जी की पुस्तक "ग़ज़ल की बाबत" खरीद सकते हैं। 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 1, 2016 at 4:14pm

इस सुंदर ग़ज़ल के लिए हार्दिक  बधाई भाई धर्मेन्द्र जी   बह २२ २२ २२ २२ २ भी की जा सकती है अथवा नहीं मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है पर ऐसा  समीचीन लगा .मुझे ऐसा लगा इसलिए लिखा  अन्यथा मत लीजियेगा ..सादर 

Comment by Samar kabeer on April 1, 2016 at 2:53pm
जनाब धर्मेन्द्र कुमार जी आदाब,बढ़िया ग़ज़ल हुई,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ ।
Comment by Sushil Sarna on April 1, 2016 at 1:51pm

ठंडी लगे है धूप जलाती है चाँदनी
देखो हमारे प्यार ने क्या क्या बदल दिया

वाह बहुत खूब आदरणीय ... खूबसूरत भावों की इस ग़ज़ल के लिए दिल से बधाई स्वीकार करें।

Comment by नादिर ख़ान on April 1, 2016 at 12:59pm

बहुत खूब कहा आदरणीय धर्मेंन्द्र जी, हर शेर अपने आप में कहानी कह रहा है।  इस शानदार  लिए बहुत मुबारकबाद ... 

Comment by maharshi tripathi on April 1, 2016 at 11:34am

सुन्दर गजल कही है आपने आ.धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी ,सर कृपया 

"इसकी रगों में बह रही नफ़रत ही बूँद बूँद"

का बहर समझा दें 

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