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ग़ज़ल ,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी ,,,,,,,

२२ २२ २२ २

आयत हो चौपाई हो
तुम रब की परछाई हो

सारा आलम झूम उठा
तुम तो इक शहनाई हो

मेरा गम है छूमन्तर
तुम तो यार दवाई हो

जीवन रोज दिसम्बर गर
तेरी याद रजाई हो

होश हुआ जख्मी देखो
तुम भी तो बलवाई हो

गुमनाम नशीली रुत गो
तेरे घर से आई हो


मौलिक व अप्रकाशित

गुमनाम पिथौरागढ़ी

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 7, 2015 at 12:02am

ग़ज़ल पर दाद कुबूल करें, गुमनाम भाई.. 

Comment by shree suneel on December 5, 2015 at 8:01pm
जीवन रोज दिसम्बर गर
तेरी याद रजाई हो... व्वाहह.. बहुत ख़ूब आदरणीय गुमनाम साहब.
हार्दिक बधाई आपको इस प्रस्तुति पर. सादर
Comment by gumnaam pithoragarhi on November 26, 2015 at 8:41pm

धन्यवाद दोस्तो .........

Comment by Ravi Shukla on November 26, 2015 at 1:29pm

आदरणीय गुमनाम जी छोटी बह्र को खुब ही साधा है आपने बधाई स्‍वीकार करें

जीवन रोज दिसम्बर गर
तेरी याद रजाई हो ......अच्‍छा शेर है

Comment by DIGVIJAY on November 25, 2015 at 7:57pm

मुझे गजल कि बहुत अच्छी समझ तो नहीं पर निश्चित ही पाठक कि द्रष्टि से इतना तो अवश्य कह सकता हूँ कि कमाल कर दिया आपने । बधाई स्वीकारे 

Comment by TEJ VEER SINGH on November 25, 2015 at 7:23pm

हार्दिक बधाई आदरणीय गुमनाम जी!बेहतरीन गज़ल!

Comment by Sushil Sarna on November 25, 2015 at 5:33pm

आयत हो चौपाई हो
तुम रब की परछाई हो

बहुत सुंदर बात कही है आदरणीय। इस सुंदर भावात्मक ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by Shyam Narain Verma on November 25, 2015 at 2:41pm
 इस सुंदर ग़ज़लक़े लिए हार्दिक बधाई

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