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११२१२ / ११२१२ / ११२१२ / ११२१२

आ के फ़िर से खूने जिगर तू कर, दिलो-जान तुझपे फ़िदा करूँ
कोई कैनवास नया दे, रंगे-वफ़ा मैं फ़िर से भरा करूँ

.

तेरी आँख को कभी झील तो कभी आसमां कहूँ और शाम
उसी खिडकी पर मै पलक बिछा, अपलक क़ुरान पढ़ा करूँ

.

नहीं चाँदनी है नसीब मेरा तो ख़्वाब रख के सिराहने
तेरी स्याह गेसुओं में छुपे हुए, जुगनुओं को गिना करूँ

.

तेरी बज्म के हैं जो क़ायदे, न कभी कुबूल रहे मुझे
मुझे तिश्नगी मिली बेहिसाब, हिसाब में क्यूँ पिया करूँ?

.

न शबाब है न शराब है,लत-ए-बेख़ुदी तो खराब है
ये गिलास भर दे मेरे ख़ुदा,मै बिन उसके होश का क्या करूँ

.

न विसाले-य़ार मुझे,तलाशे-खुदा भी तो नही ‘जान’ अब
ये फरेब ख़ुद को दूँ और तुझको मैं भूलने की दुआ करूँ

*****************************************
मौलिक व् अप्रकाशित © ‘जान’ गोरखपुरी
*****************************************

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Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on October 5, 2015 at 10:20pm

सादर आभार आ० विजय सर!गज़ल पर आपकी उपस्थिति पाकर अभिभूत हुआ!नमन!

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 5, 2015 at 10:11pm
आ के फ़िर से खूने जिगर तू कर, दिलो-जान तुझपे फ़िदा करूँ
कोई कैनवास नया दे, रंगे-वफ़ा मैं फ़िर से भरा करूँ
बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल , प्रिय कृष्ण मिश्र जी , बधाई , सादर।
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on October 5, 2015 at 10:02pm

गजल पर आपके इस स्नेह के लिए बहुत आभारी हूँ आ० सुशील सरना जी!

सादर.

Comment by Sushil Sarna on October 5, 2015 at 7:32pm

नहीं चाँदनी है नसीब मेरा तो ख़्वाब रख के सिराहने
तेरी स्याह गेसुओं में छुपे हुए, जुगनुओं को गिना करूँ

गज़ब गज़ब गज़ब … इन रेशमी अहसासों से लबरेज़ ग़ज़ल के लिए दिल से शेर दर शेर दाद कबूल फरमाएं आदरणीय।

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on October 5, 2015 at 6:22pm
आ.गोपाल सर गजल पर आपकी भरपूर प्रतिक्रिया पाकर नवऊर्जा का संचार हुआ।सादर नमन।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 5, 2015 at 8:57am

प्रिय कृष्णा -बहुत बढ़िया  शानदार -जानदार ,

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on October 4, 2015 at 8:55am
उत्साहवर्धन के लिए आपका शुक्रिया आ.रूपेंद्र जी।
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on October 4, 2015 at 8:53am
आ गिरिराज सर आपका अनुमोदन पाकर बहुत राहत हुयी,इस बह्र में शिकस्ते-नारवा पर मार्गदर्शन चाहता हूँ.सादर।
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on October 4, 2015 at 8:46am
गजल पर आपकी मुक्त कंठ से प्रसंशा पाकर बहुत उत्साहित हूँ।आ.आशुतोष सर सादर आभार।स्नेह बना रहे।
Comment by Dr.Rupendra Kumar Kavi on October 3, 2015 at 5:12pm

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