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ग़ज़ल-वो दुश्मनी की सब हदों को--

                           ग़ज़ल

 

                  (वहर :  2212  2212  2212  2212 )

वो दुश्मनी की सब हदों को पार करता ही रहा I

मैं माफ़ उसको जान कर हर बार करता ही रहा II

 

जो आह भर भर हर समय थे देखते राहें सदा ,

उनके दिलों से वो सदा व्यापार करता ही रहा I

 

दिल से न शाया था हटा, कुछ तो नजर ढूंढे तभी ,

पहचानता है क्या उसे, इनकार करता ही रहा I

 

राजा दिलों का वो बनें, है मर नहीं सकता कभी ,

इंसान पे जो भी सदा उपकार करता ही रहा I

 

आका बना खुद का, कभी गैरत न जो छोड़े वही

हो सुर्खरू, दुश्मन भले सौ वार करता ही  रहा I

 

कुर्बान कर अपनी जवानी देश पर उसको है फख्र ,

की पीढियां बलिदान फिर भी प्यार करता ही रहा I

 

कर पाया कोई बन्दगी है देश की कुछ इस तरह ,

खुद के तसव्वुर से भी जो तकरार करता ही रहा I    

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

डॉ.कंवर करतार 'खन्देह्ड़वी'

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Comment by कंवर करतार on October 5, 2015 at 9:36pm

कृषन मिश्र जी ग़ज़ल की दाद पर दिल से धन्याबादI 

Comment by कंवर करतार on October 5, 2015 at 9:32pm

भाई मिश्र जी होसलाफ्साई के लिए कोटो कोटि धन्यावाद I

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on October 5, 2015 at 6:32pm
आ.आपकी पहली गजल पढ़ रहा हूँ।बेहतरीन मतले के साथ बहुत अच्छी गजल हुयी है।हार्दिक बधाई।सादर।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 5, 2015 at 12:52pm

आदरणीय कँवर जी ..इस सुंदर सशक्त रचना के लिए ढेर सारी बधाई स्वीकार करे सादर 

Comment by कंवर करतार on October 3, 2015 at 2:44pm

भंडारी भाई ,बस आपकी टिपणी का ही इन्तजारकर रहा था Iआपकी नजर में ग़ज़ल अच्छी बन पाई है तो मेरा प्रयास सफल हो गयाI बस इसी तरह नजरे इनायत से रचनाओं को तोलते रहिएगा ,आभारी हूँगा ,सादर I  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 3, 2015 at 2:23pm

आदरनीय डा. कँवर भाई , बहुत सुन्दर गज़ल हुई है , हार्दिक बधाइयाँ आपको ॥

Comment by कंवर करतार on October 3, 2015 at 1:52pm

श्याम बर्मा जी ग़ज़ल की सराहना के धन्यावादI

Comment by कंवर करतार on October 3, 2015 at 1:51pm
Comment by Shyam Narain Verma on October 3, 2015 at 10:07am

बहुत सुंदर, भावनाओं से परिपूर्ण इस गजल पर आपको बहुत बहुत बधाई 

सादर,

Comment by maharshi tripathi on October 2, 2015 at 11:57pm

राजा दिलों का वो बनें, है मर नहीं सकता कभी ,

इंसान पे जो भी सदा उपकार करता ही रहा I,,,,,,इंसानियत को परिभाषित करता सुन्दर शेर ,,बधाई आपको आ. डॉ.कंवर करतार 'खन्देह्ड़वी' जी |

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