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नैतिकता की गिनती होती है सामानों में- ग़ज़ल

22 22 22 22 22 22 2
नैतिकता की गिनती होती है सामानों में
व्यापार बना है अब रिश्ता हम इंसानों में

सिमट गई सारी दुनिया मोबाइल में लेकिन
बढ़ गई दूरी घर के बैठक औ’ दालानों में

छो़ड़ धरा उड़नेवालों याद रहे तुमको ये
शाख नहीं होती सुस्ताने को अस्मानों में

आकांक्षायें भूल गईं हैं रिश्तों को अब तो
स्वार्थ छुपा दिखता है लोगों की मुस्कानों में

मादा जिस्मों को तकती आवारा नज़रों को
धर्मों के रक्षक रक्खेंगे किन पैमानों में

अपनी ओछी नज़रों को ढांके पहले तो वो
जो दोष निकाले है नारी के परिधानों में

-मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by गिरिराज भंडारी on September 19, 2015 at 4:00pm

आदरणीय शिज्जु भाई , सभी अश आर जीवन की कुछ सच्चाइयाँ बयान कर रहे हैं , बहुत सुन्दर गज़ल हुई है , दिली बधाइयाँ आपको ।
आकांक्षायें भूल गईं हैं रिश्तों को अब तो
स्वार्थ छुपा दिखता है लोगों की मुस्कानों में --  ये शे र बहुत अच्छा लगा ! आपको पुनः बधाई ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 17, 2015 at 10:16pm
आदरणीय अहसास जी आप सही पढ़ रहे हैं। इस बह्र में 22 को छूट के अनुसार 121 211 112 भी किया जा सकता है। बशर्ते कोई शब्द जिसका वज्न 21 या 12 है उसके बाद वाले शब्द का वज्न भी 12 या21 हो।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 17, 2015 at 10:10pm
ग़ज़ल की सराहना के लिये आप सभी का हार्दिक आभार
Comment by मनोज अहसास on September 17, 2015 at 9:38pm
सिमट गई सारी दुनिया मोबाइल में लेकिन
बढ़ गई दूरी घर के बैठक औ’ दालानों में

सर
मुझे इस शेर की मात्रा गणना में समस्या लग रही है
जैसे सिमट को मैं 12 पढ़ रहा हूँ
गई को 12
कृपिया निर्देशित कर दें
सादर
Comment by मनोज अहसास on September 17, 2015 at 8:41pm
इस खूबसूरत हसीन ग़ज़ल के लिए दिल से दाद सर
सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 17, 2015 at 5:08pm

आदरणीय शिज्जु भाई जी बढ़िया ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर दाद कुबूल फरमाएं 

Comment by जयनित कुमार मेहता on September 17, 2015 at 3:58pm

यथार्थ से जुडी रचना, बधाई स्वीकारें..!

Comment by Ravi Shukla on September 17, 2015 at 2:07pm
आदरणीय शिज्जु शकूर जी आदाब शानदार ग़ज़ल के लिए दाद हाज़िर है । सोशल मीडिया के दुष्परिणामो को रेखांकित करता है आपका ये शेर
सिमट गई है सारी दुनिया मोबाईल में लेकिन
बढ़ गई है दूरी घर के बैठक औ दालानों में
दिली दाद क़ुबूल करें ।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 17, 2015 at 1:32pm

आ० शिज्जू जी

आपकी कलम से एक और  अच्छी एवं मुबारक गजल

कृपया ध्यान दे...

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