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ग़ज़ल - आप लें हाथ बाँसुरी तो क्या ( गिरिराज भंडारी )

2122 1212    112 /22

डर के यूँ ज़िन्दगी बची तो क्या

और अगर बच नहीं सकी तो क्या

 

देख क्या आदमी ही जीता है ?

आदमी में है आदमी तो क्या

 

जब कहे को नही समझते हैं 

रह गई बात अनकही तो क्या

 

भूख आदाब कब  समझती है

बे अदब थोड़ी हो गयी तो क्या  

 

जारी फिर चाँद ने किया फतवा

बे असर चाँदनी रही तो क्या

 

फूल पत्तों में आज खुशियाँ हैं

जड़ अँधेरों से है घिरी तो क्या

 

दुन्दुभी ही उधर से बजती है

आप लें हाथ बाँसुरी तो क्या

 

मेरी बस्ती में धूप है काइम

हो कहीं और चाँदनी तो क्या

 

और क्यों आपको नहीं लगते ?

मै ज़रा सा हूँ मजहबी तो क्या

****************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment

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Comment by kanta roy on August 21, 2015 at 8:54am
यही तो बडी मुश्किल है आदरणीय गिरीराज भंडारी जी , सच ही कहा है आपने कि ....

दुन्दुभी ही उधर से बजती है
आप लें हाथ बाँसुरी तो क्या....... वाह !!!!! बेहतरीन गजल हुई है आपकी यह भी । बधाई

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on August 20, 2015 at 9:45pm
बेहतरीन अश आर से सजी ग़ज़ल के लिए बधाई सर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 20, 2015 at 4:30pm

आदरणीय बड़े भाई विजय जी , आपकी उपस्थिति से गज़ल गौरवांवित हुई , सराहना के लिये आपका हृदय से आभारी हूँ ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 20, 2015 at 4:29pm

आदरणीय नीरज प्रेम भाई , आपके स्न्हेहिल सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 20, 2015 at 4:27pm

आदरणीय सुशील भाई , हौसला अफ्ज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया आपका ।

Comment by vijay nikore on August 20, 2015 at 3:52pm

बहुत ही दिलकश गज़ल लिखी है।

हर एक शेर से लुत्फ़ आया।

बधाई, भाई गिरिराज जी।

Comment by Neeraj Nishchal on August 20, 2015 at 2:33pm

वाह भंडारी साहब  मै तो कुछ कहने  काबिल ही न रहा आपकी ग़ज़ल
पढ़कर ……………
देख क्या आदमी ही जीता है ?
आदमी में है आदमी तो क्या

कितना सारभूत कितना गुढ़ रहस्य लिए हुए आपका  ये  शेर क्या कहूँ …………
क्या कह सकूँगा .............

Comment by Sushil Sarna on August 20, 2015 at 1:27pm

मेरी बस्ती में धूप है काइम
हो कहीं और चाँदनी तो क्या

वाह आदरणीय गिरिराज जी वाह बहुत ही खूबसूरत अशआर कहे हैं आपने इस शे'र की गहराई तो गज़ब … हार्दिक बधाई कबूल फरमाएं सर।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 20, 2015 at 12:24pm

आदरणीय मिथिलेश भाई ,शे र दर शेर हौसला अफज़ाई का तहे दिल से  शुक्रिया आपका ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 20, 2015 at 11:44am

आदरणीय गिरिराज सर, शानदार ग़ज़ल हुई है. शेर दर शेर दाद हाज़िर है.  मतला और ये शेर बहुत ही लाजवाब है-

डर के यूँ ज़िन्दगी बची तो क्या

और अगर बच नहीं सकी तो क्या ...शानदार  मतला 

 

देख क्या आदमी ही जीता है ?

आदमी में है आदमी तो क्या....... वाह वाह 

 

जब कहे को नही समझते हैं 

रह गई बात अनकही तो क्या........... बेहतरीन शेर हुआ है 

 

भूख आदाब कब  समझती है

बे अदब थोड़ी हो गयी तो क्या ..... हासिल ए ग़ज़ल 

 

दुन्दुभी ही उधर से बजती है

आप लें हाथ बाँसुरी तो क्या.......... कमाल का शेर 

सादर 

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