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वो कहाँ निकले

कहाँ से चले थे
वो कहाँ से निकले,
जहाँ लगाए थे पौधे
वो कहाँ निकले।
वेा रात का सन्नाटा
बादल का कहर,
जो घर बह गये थे
वो कहाँ निकले।
दुष्मन के घर आज है
बहुत बड़ा जलसा,
दोस्त मेरे अपने
आज कहाँ निकले।
जुलाहे यूँ कर धागे
पर गिरह न पड़ पाये
गाँठ एक बार लगे तो
फिर कहाँ निकले
मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 508

Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on October 1, 2016 at 1:44pm

कहाँ से चले थे
वो कहाँ से निकले,
जहाँ लगाए थे पौधे
वो कहाँ निकले।............वाह ! सुंदर रचना. सादर.

Comment by S.S Dipu on August 20, 2015 at 8:47am
गिरिराज भंडारी जी धन्यवाद । सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 20, 2015 at 6:29am

दुष्मन के घर आज है
बहुत बड़ा जलसा,
दोस्त मेरे अपने
आज कहाँ निकले।  --- बहुत सुन्दर पंक्तिया ! हार्दिक बधाई ।

Comment by pratibha pande on August 19, 2015 at 9:46pm
गाँठ एक बार लगे तो, फिर कहाँ निकले / बहुत सुंदर रचना है दीपू जी ,बधाई आपको सादर
Comment by S.S Dipu on August 19, 2015 at 8:32pm
Laxman dhami ji आपका बहुत बहुत धन्यवाद । सादर
Comment by S.S Dipu on August 19, 2015 at 8:30pm
धन्यवाद Jawahar lal singh ji . सादर
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on August 19, 2015 at 12:22pm

जुलाहे यूँ कर धागे
पर गिरह न पड़ पाये
गाँठ एक बार लगे तो
फिर कहाँ निकले... अति सुन्दर! दीपू जी!

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 18, 2015 at 10:41am

हार्दिक बधाई

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