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दिल चाहता है तुझसे कभी, ना गिला करूँ

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दिल चाहता है तुझसे कभी, ना गिला करूँ,
इस ज़िन्दगी में तुझसे यही सिलसिला करूँ |

दिन भर शराब पी के हुआ,था मैं दरबदर,
अब ढूंढता हूँ चादर ग़मों की सिला करूँ |

नफरत थी जिन दिलों में, भुलाया नहीं मुझे,
दिल में बता खुदा, उनके, कैसे खिला करूँ |

अमन-ओ-अमां के साये ही जिनसे नसीब हो,
ऐसे चमन  जमी दर ज़मीं  काफिला करूँ |

तन्हा है सब सफ़र और तनहा हैं रास्ते,
अब सोचता हूँ तुझसे यहाँ ही मिला करूँ |



मौलिक व अप्रकाशित © हर्ष महाजन

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Comment

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Comment by Harash Mahajan on August 8, 2015 at 4:32pm

आदरणीय Samar kabeer जी ग़ज़ल को दुबारा कहने की कोशिश की है आपसे तथा गुनीजनों से इस संशोदित रूप पर नज़र डालने की गुजारिश है |

दिल चाहता है तुझसे कभी, ना गिला करूँ,

इस ज़िंदगी को तुझसे कभी क्यूँ जुदा करूँ |

दिन भर शराब पीता हूँ रोता हूँ दरबदर,
ज़ख्मों भरे मैं सीने को ऐसे सिया करूँ |

 

नफरत थी जिन दिलों में, भुलाया नहीं मुझे,
उनके दिलों में कैसे खुदाया खिला करूँ |

अमन-ओ-अमां के साये ही जिनसे नसीब हो,

ऐसे शज़र ज़मीं पे लगाता चला करूं |


जिसने मेरे दामन को टुकड़ों, में किया होगा,
अब ‘हर्ष’ सोचता हूँ मैं उससे मिला करूँ |

०००

Comment by Harash Mahajan on August 8, 2015 at 11:31am

आदरणीय समर कबीर जी आदाब !! सबसे पहले तो आपका मैं तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ के आपने  मेरी इस रचना पर कदम रखा और अपनी महतवपूर्ण राय मेरी इस तहरीर पर रखी | आपकी  राय के मुताबिक मैं इसे एक बार दुबारा कहने की कोशिश करता हूँ और नए मिसरों के साथ फिर आपकी खिदमत में हाज़िर होता हूँ सर | आभार !!

Comment by Samar kabeer on August 7, 2015 at 11:10pm
जनाब हर्ष महाजन जी,आदाब,ग़ज़ल की कोशिश तो अच्छी है,कुछ मिसरों की तरफ़ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा :-

(1)"अब ढूंढता हूँ चादर ग़मों की सिला करूँ"

:- इस मिसरे में एक तो लय बाधित हो रही है,दूसरी बात कि क़ाफ़िया काम नहीं कर रहा है,"सिया करूँ" को बहालत-ए-मजबूरी "सिला करूँ" बाँधा है ।

(2)"दिल में बता खुदा, उनके, कैसे खिला करूँ"

:- यह मिसरा भी लय में नहीं है,चाहें तो इसे इस तरह कर लें :-

"मैं उनके दिल में कैसे ख़ुदाया खिला करूँ"

(3)"अमन-ओ-अमां के साये ही जिनसे नसीब हो,
ऐसे चमन जमी दर ज़मीं काफिला करूँ"

:- इस शैर के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है,दूसरी बात सानी मिसरा बह्र से ख़ारिज है ।

(4)"तन्हा है सब सफ़र और तनहा हैं रास्ते"

:-ये मिसरा भी लय में नहीं है,देख लीजियेगा ,बाक़ी शुभ-शुभ ।

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