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एक ग़ज़ल - सुलभ अग्निहोत्री

सच कहने की हलफ़ उठाई
अपनों से दुश्मनी निभाई

जिसके हाथ तुला दी उसने
पल्ले में पासंग लटकाई

दीपक तले अंधेरा देखा
देखी रिश्तों की गहराई

हम भी बर्फ़-बर्फ़ हैं केवल
जब से पाई है ऊँचाई

शेर कटघरे के अन्दर हो
कुछ ऐसे ही है सच्चाई

अपने ही दुखड़ों में खोये
कैसे पढ़ते पीर पराई

फूट पड़ा आवेग पिघलकर
जब सावन की पाती आई

जिसने कपड़े आप उतारे
उसको कैसी जगत हँसाई

मुथरी है तलवार भले ही
लेकिन दिल है हातिमताई

मौलिक एवं अप्रकाशित

- सुलभ अग्निहोत्री

Views: 768

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Comment by Sulabh Agnihotri on August 6, 2015 at 10:22am

बहुत-बहुत आभार, आदरणीय  krishna mishra 'jaan'gorakhpuri जी !

Comment by Sulabh Agnihotri on August 6, 2015 at 10:20am

बहुत-बहुत आभार, आदरणीय गिरिराज भंडारी  जी !

Comment by Manan Kumar singh on August 6, 2015 at 7:21am
बधाई
Comment by Manan Kumar singh on August 6, 2015 at 7:19am
बहुत बढ़िया

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 5, 2015 at 9:28pm

आदरणीय सुलभ अग्निहोत्री जी, इस बेहतरीन ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई 

दीपक तले अंधेरा देखा
देखी रिश्तों की गहराई

सादर 

Comment by Sushil Sarna on August 5, 2015 at 7:41pm

फूट पड़ा आवेग पिघलकर
जब सावन की पाती आई
वाह बहुत सुंदर अशआर हैं आदरणीय … हार्दिक बधाई।

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on August 5, 2015 at 7:10pm

हम भी बर्फ़-बर्फ़ हैं केवल
जब से पाई है ऊँचाई......................बेहद उम्दा! बधाई आदरणीय!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 5, 2015 at 4:56pm

आदरनीय सुलभ भाई , छोटी बहर मे अच्छी ग़ज़ल हुई है , हार्दिक बधाई आपको ।

कृपया ध्यान दे...

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