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2122 2122
मेघ जब होता सजल है,
नेह हो जाता नवल है।
ख्वाहिशों की दूब सूखी,
चाहती कुछ तो चपल है।
देह जो बेसुध पड़ी है,
ढूँढती फिर से पहल है।
शब्द कबसे कर रहा अब,
भाव भूले की टहल है।
मौन रुख अब माँग लूँ मैं,
मन अभी जाता मचल है।
होंठ सूखे,जीभ जलती,
लद गये हैं मेघ जल है।
भींग जाने दो अभी भी,
मान तेरा जो अचल है।
मानता हूँ मानिनी मैं,
प्यार तेरा तो अतल है।
मान जा,री मान तज कर,
आखिरी मेरी पहल है।
"मौलिक व अप्रकाशित"@मनन

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Comment

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Comment by Manan Kumar singh on August 6, 2015 at 11:10pm
आदरणीय जवाहर जी,आभार आपका।
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on August 6, 2015 at 9:19am

वाह बहुत ही सुन्दर! हर पंक्तियाँ बेहद ही खूबसूरत हुई है 

Comment by Manan Kumar singh on August 5, 2015 at 8:53pm
आदरणीय कृष्ण मिश्र जी,शेर-दर-शेर सराहना के लिए आपका आभार।
Comment by Manan Kumar singh on August 5, 2015 at 8:51pm
आदरणीय गिरिराज भाई,प्रेरणा हेतु आपको धन्यवाद६
Comment by Manan Kumar singh on August 5, 2015 at 8:49pm
श्रद्धेय मिथिलेश जी, शेर इंगित कर सराहना हेतु धन्यवाद आपको
Comment by Manan Kumar singh on August 5, 2015 at 8:47pm
श्रद्धेय रवि शुक्ला जी,आभार आपका।
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on August 5, 2015 at 7:31pm

मेघ जब होता सजल है,
नेह हो जाता नवल है।..........बहुत सुन्दर मतला


ख्वाहिशों की दूब सूखी,
चाहती कुछ तो चपल है।.......क्या कहने

देह जो बेसुध पड़ी है,
ढूँढती फिर से पहल है।..................वाह वाह!

बहुत ख़ूब आदरणीय! हार्दिक बधाई !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 5, 2015 at 1:45pm

आदरणीय मनन भाई , छोटी बहर मे अच्छी ग़ज़ल कही है , हार्दिक बधाइयाँ ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 5, 2015 at 12:21pm

मेघ जब होता सजल है,
नेह हो जाता नवल है।

मान जा,री मान तज कर,
आखिरी मेरी पहल है।

आदरणीय मनन जी बढ़िया प्रस्तुति ... आपको हार्दिक बधाई 

Comment by Ravi Shukla on August 5, 2015 at 12:19pm

आरणीय मनन जी

ग़जल़ के शिल्‍प के लिये बधाई ।

कृपया ध्यान दे...

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