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ग़ज़ल - हर औरत में सुरसा भी है, और सभी में सीता है ( गिरिराज भंडारी )

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पेडों पर इल्जाम लगा वो ख़ुद की खातिर जीता है

सोच रहा हूँ मैं सागर क्या अपना पानी पीता है ?

 

झूठा- सच्चा , सही ग़लत ये सब बे पर की बातें हैं

दिखे फाइदा, सच को मोड़ो जिसको जहाँ सुभीता है

 

सभी उँगलियाँ अलग हो गईं अहम बीच में आने से

चुल्लू में कुछ रुका नहीं , जो रीता था, वो रीता है 

 

शब्द कोश बस रट लेने से भाव नहीं पैदा होता

व्यर्थ हाथ में रख लेना क़ुरआन बाइबिल गीता है

 

हर इच्छायें अजगर जैसी लिपटी रहती हैं मन से

और समय का पंजा झपटे जैसे कोई चीता है

 

हर आदम में कृष्ण- कंस है ,  राम जहाँ है रावण भी

हर औरत में सुरसा भी है,  और सभी में सीता है

 

जोंक नुमा किरदार कहूँ या अमर बेल इसको बोलूँ 

जो पर जीवी जिससे लिपटा उसका खूँ ही पीता है

*************************************************

गिरिराज भंडारी

Views: 835

Comment

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Comment by amod shrivastav (bindouri) on July 16, 2015 at 10:39pm
वाह सर बधाई
Comment by Dr. Vijai Shanker on July 16, 2015 at 8:09pm
सोच रहा हूँ मैं सागर क्या अपना पानी पीता है ?
दिखे फाइदा, सच को मोड़ो जिसको जहाँ सुभीता है
चुल्लू में कुछ रुका नहीं , जो रीता था, वो रीता है
व्यर्थ हाथ में रख लेना क़ुरआन बाइबिल गीता है
और समय का पंजा झपटे जैसे कोई चीता है
हर औरत में सुरसा भी है, और सभी में सीता है
जो पर जीवी जिससे लिपटा उसका खूँ ही पीता है
बहुत ही सुन्दर, सारगर्भित , सोचने को मजबूर करती प्रस्तुति, आदरनीय गिरिराज भंडारी जी , बहुत बहुत बधाई इन पंक्तियों पर, सादर।
Comment by दिनेश कुमार on July 16, 2015 at 4:24pm
बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है आदरणीय गिरिराज सर जी। मुबारकबाद।
यह बह्र मेरे लिए थोड़ी नई है सर, इसके बारे में थोड़ा खुलासा करें सर, कि कौन कौन सी छूट इसमें मिल सकतीं हैं? अभी तक मैंने इस पर कोशिश नहीं की है।
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 16, 2015 at 4:07pm

वाह आदरणीय गिरिराज जी, दाद कुबूल करें

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on July 16, 2015 at 3:40pm

ग़जब .....बहुत उम्दा ग़ज़ल ....दाद कबूल करें जनाब .....सादर 

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