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तितली के इतने रूपों को

कभी न देखा 

कभी न जाना परखा मैंने ..

देखा तो बस मैंने इतना

रंगबिरंगी उडती तितली

पलक झपकते पर सिकोड़ती और फैलाती 

जल्दी-जल्दी ...फूल फूल पर उड़कर जाती

जैसे कोई समाज सेविका बड़े प्यार से

दुखियारों के दर पर जाती ...

उनके सारे दुःख समेट कर 

अपनेपन  का भाव जगाती

थोडा सा मन को हर्षाती 

फूल सभी खिल से उठते हैं

जब तितली बगिया  में आती ...

सोच नहीं पाता क्यों कोई

क्यों तितली बगिया में आती ?

हम सारे भी तितली जैसे 

रहें न क्यों इस जग उपवन में 

चूस दुखों को हर्षित कर दें

आशागार्भित मानव मन को 

आचार्यप्रवर आदरणीय सलिल जी की कविता 'तितलियाँ'पर मेरे उदगार  आचार्य जी को समर्पित

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Comment by Neelam Upadhyaya on April 11, 2011 at 10:10am

Prakriti ki khoobsoorti ko ukerti bahut hi badhiya rachna.  Badhayee swikar kare.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 10, 2011 at 12:03pm
बहुत सुंदर शब्द चित्रण, प्राकृतिक खूबसूरती का एहसास कराती खुबसूरत रचना , बधाई डाक्टर साहिब |
Comment by Sanjay Rajendraprasad Yadav on April 9, 2011 at 1:41pm

" कुदरत की रंग-विरंगी तितलियों को देखे बहुत दिन बीत गए जो प्रकृत की सान सोभा बठाती है ,

 पर आज मानव सामाज में कुछ और ही लोग तितलियों की तरह उड़ फुर्र -फुर्र  इठलाती है"

जो स मा ज में घ त क हो जाती है,

 

आप को बहुत बहुत धन्यवाद  जी

Comment by Aakarshan Kumar Giri on April 9, 2011 at 9:48am
bhaut barhiyaa....
Comment by sanjiv verma 'salil' on April 8, 2011 at 11:07pm
apki gungrahakata ko naman.

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