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ग़ज़ल -- ये मेरा असर है ( गिरिराज भंडारी )

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ले, कदमों पे सर है

लो, अब भी कसर है

 

जो मर ही चुके हो

तो अब किसका डर है

 

नहीं ख़त्म होगा

ये मेरा असर है

 

नहीं कोई मंज़िल

महज़ रह ग़ुज़र है

 

तो घर में ही बैठो

अगर तुमको डर है

 

लिखे शह्र जिसको

हमें वो शहर है

 

नहीं है जो कड़वा

वो मीठा ज़हर है

 

लो, अन्धों से  सुन लो 

कहाँ रह गुज़र है

****************

मौलिक एवँ अप्राशित

 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 25, 2015 at 8:39pm

आदरणीय केवल भाई , आप सही कह रहे हैं ,काफिया बन्दी मे गलती हुई है , सुधारने की कोशिश करूँगा ।

गज़ल की सराहना के लिये आपका शुक्रिया

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 25, 2015 at 8:13pm

//ले, कदमों पे सर है

लो, अब भी कसर है// ...शानदार गज़ल के लिये दाद कुबूल फरमायें . मेरे जह्न में एक सवाल  उठ रहा है...

आ0 भंडारी भाई जी....उक्त मतले के उला व सानी दोनों में  **सर है** और **सर है**  रदीफ लिया गया है....किंतु काफिया को  "पे" और "क"  किस प्रकार निभाया गया है, फिर बाद में आपने डर,गुज़र, शज़र आदि किस आधार पर रखा है..?

Comment by shree suneel on June 25, 2015 at 6:28pm
ले, कदमों पे सर है
लो, अब भी कसर है... क्या बात है.. ख़ूब... ख़ूब
अच्छी ग़ज़ल आदरणीय गिरिराज सर जी. मज़ा आया. हार्दिक बधाई आपको.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 25, 2015 at 3:11pm

आदरणीय नरेन्द्र भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका हृदय से आभारी हूँ ॥

Comment by narendrasinh chauhan on June 25, 2015 at 3:05pm

वाह खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकारें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 25, 2015 at 1:36pm

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , आपका हार्दिक आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 25, 2015 at 1:36pm

आदरणीय श्याम भाई , आपका बहुत आभार ।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 25, 2015 at 10:57am

छोटी बहर पर कमाल -धमाल , वाह अनुज .

Comment by Shyam Narain Verma on June 25, 2015 at 9:58am

वाह खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकारें

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