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ग़ज़ल -- दुश्मनों से भी मुहब्बत करना .

2122-1122-22.

अपनी मंज़िल की जो हसरत करना
घर से चलने की भी हिम्मत करना
.
कोई तुझको जो अमानत सौंपे
जान देकर भी हिफ़ाजत करना
.
कहना आसान है करना मुश्किल
दुश्मनों से भी मुहब्बत करना
.
आज बचपन में है वो बात कहाँ
वक़्त बे-वक़्त शरारत करना
.
तेरे भीतर का ख़ुदा जाग उठे
इतनी शिद्दत से इबादत करना
.
सिर्फ कहने को ही तेरा न हो वो
उसके दुख दर्द में शिरक़त करना
.
फ़र्ज़ औलाद का यह होता 'दिनेश'
अपने माँ बाप की ख़िदमत करना
.
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by दिनेश कुमार on June 10, 2015 at 4:15pm

हौसला अफ़्ज़ाई करने के लिए शुक्रिया आ. गोपाल सर जी.

मैं भी अभी नौसिखिया हूँ . गुणीजन ही बता सकते हैं .

Comment by दिनेश कुमार on June 10, 2015 at 4:12pm

हौसला अफ़्ज़ाई करने के लिए शुक्रिया आ. सुशील जी.

Comment by दिनेश कुमार on June 10, 2015 at 4:10pm

सराहना के लिए शुक्रिया आ. सुनील प्रसाद जी .

कई जगह मात्राएं गिरा कर पढ़ने की कोशिश की है, सर. गुणीजन ही सही या गलत बता सकते हैं सर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 10, 2015 at 12:45pm

दिनेश भाई

गजल बेशक अच्छी है . बह्र के  मामले में मुझे भी कुछ संदेह है , देखे गुनीजन क्या कहते हैं !

 

Comment by Sushil Sarna on June 10, 2015 at 12:08pm

अपनी मंज़िल की जो हसरत करना

घर से चलने की भी हिम्मत करना


कोई तुझको जो अमानत सौंपे

जान देकर भी हिफ़ाजत करना

वाह .... बहुत खूबसूरत अहसास पिरोये हैं आपने इस ग़ज़ल में आदरणीय। हार्दिक बधाई।

Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on June 10, 2015 at 11:50am
गजल के बयानी को सलाम है आदरणीय दिनेश भाई मगर बह्र की सटीकता समझ न सका हो सकता है मेरी ही नासमझी हो ज्यादातर शुरुआत 22के वज्न से हुई है फिर भी भावपक्ष उतम बने हैं आपको बधाई है।

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