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ग़ज़ल - फिल बदीह - मिसरा - खूब सूरत है मगर ये आपसे प्यारा नहीं ( गिरिराज भंडारी )

2122 2122 2122 212

है कोई क्या इस जहाँ में जो कभी हारा नहीं
"सिर्फ़ पाया हो यहाँ पर और कुछ खोया नहीं"

पत्थरों के बीच रह के मै भी पत्थर की तरह
दर्द की बस्ती में रह कर, देखिये रोया नहीं

ख़्वाब की बातें कहूँ क्या, नींद जब दुश्मन हुई
माँ का साया जब से रूठा , तब से मैं सोया नहीं

बादलों में खेमा बन्दी भी हुई क्या ? आज कल
क्यों मेरे घर से गुज़रते वक़्त वो बरसा नहीं

मरहले के और पहले थक गया था काफिला
आबला पा था मुसाफिर वो मगर बैठा नहीं

शक्लो सूरत मै मिला के देख कर , सोचा यही
आदमी लगता है वो पर आदमी जैसा नहीं

उनके टेढ़े प्रश्न का उत्तर तो रखता हूँ मगर
हर्फ मेरे खार से हैं , इसलिये कहता नहीं
******************************************
मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment by narendrasinh chauhan on June 6, 2015 at 10:39am

शक्लो सूरत मै मिला के देख कर , सोचा यही
आदमी लगता है वो पर आदमी जैसा नहीं
उनके टेढ़े प्रश्न का उत्तर तो रखता हूँ मगर
हर्फ मेरे खार से हैं , इसलिये कहता नहीं    लाजवाब

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 6, 2015 at 8:28am

पत्थरों के बीच रह के मै भी पत्थर की तरह
दर्द की बस्ती में रह कर, देखिये रोया नहीं     वाह! वाह! बेहतरीन

ख़्वाब की बातें कहूँ क्या, नींद जब दुश्मन हुई
माँ का साया जब से रूठा , तब से मैं सोया नहीं      अभिनन्दन!

उनके टेढ़े प्रश्न का उत्तर तो रखता हूँ मगर
हर्फ मेरे खार से हैं , इसलिये कहता नहीं      बहुत सुन्दर!

बहुत बेहतरीन गजल हुयी है आ० गिरिराज सर! शेर दर शेर दिली दाद कबूल फरमाएं!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 5, 2015 at 10:32pm

आदरणीय महर्षि भाई , हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 5, 2015 at 9:08pm

आदरणीय विजय भाई , आपना सराहना और उत्साह वर्धन ही मेरा सम्बल है , आपका बहुत आभार ।

Comment by maharshi tripathi on June 5, 2015 at 7:20pm

है कोई क्या इस जहाँ में जो कभी हारा नहीं
"सिर्फ़ पाया हो यहाँ पर और कुछ खोया नहीं"

पत्थरों के बीच रह के मै भी पत्थर की तरह
दर्द की बस्ती में रह कर, देखिये रोया नहीं

ख़्वाब की बातें कहूँ क्या, नींद जब दुश्मन हुई
माँ का साया जब से रूठा , तब से मैं सोया नहीं,,,,,,,,,,वाह !

आ. गिरिराज भंडारी सर ,,,बहुत खूब अपने  अनुज की बधाई स्वीकार करें |

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 5, 2015 at 5:17pm

शक्लो सूरत मै मिला के देख कर , सोचा यही
आदमी लगता है वो पर आदमी जैसा नहीं। .
बहुत खूब, बधाई, आदरणीय गिरीराज भंडारी जी , सादर।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 5, 2015 at 4:56pm

आदरणीय मोहन सेठी भाई , हौसला अफज़ाई का बहुत शुक्रिया ।

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on June 5, 2015 at 4:18pm

कमाल कमाल ....

पत्थरों के बीच रह के मै भी पत्थर की तरह
दर्द की बस्ती में रह कर, देखिये रोया नहीं....बहुत उम्दा 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 5, 2015 at 3:54pm

आदरणीय श्याम नारायण भाई , आपका बहुत आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 5, 2015 at 3:54pm

आदरणीय विनय कुमार भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ।

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